Zero Depreciation इंश्योरेंस आपकी कार पॉलिसी के प्रीमियम को **10-20%** तक बढ़ा सकता है, लेकिन एक्सीडेंट के समय यह आपकी जेब पर पड़ने वाले बोझ को काफी कम कर देता है।
भारत में मोटर इंश्योरेंस लेना एक जरूरी फाइनेंशियल कमिटमेंट है, लेकिन एक बेसिक कॉम्प्रिहेंसिव पॉलिसी अक्सर पूरी सुरक्षा नहीं दे पाती। एक्सीडेंट होने पर इंश्योरेंस कंपनियां रिप्लेस किए गए पार्ट्स (खासकर रबर, प्लास्टिक और मेटल) पर डेप्रिसिएशन (घिसावट) काटती हैं, जिससे मालिक को अपनी जेब से पैसे भरने पड़ते हैं। 'Zero Depreciation' या 'Bumper-to-Bumper' कवर इसी कटौती को खत्म करने के लिए एक शानदार विकल्प है।
फाइनेंशियल गणित को समझें
इस कवर को लेने पर आपका सालाना प्रीमियम 10% से 20% तक बढ़ जाता है। अगर आपके पास नई कार या महंगी लग्जरी गाड़ी है, तो यह एक्स्ट्रा खर्च एक बेहतरीन फाइनेंशियल सुरक्षा साबित होता है। लेकिन, पुरानी गाड़ियों या कम रिपेयर कॉस्ट वाले मॉडल्स के लिए, कई सालों तक भरा गया ज्यादा प्रीमियम फायदे से कहीं अधिक हो सकता है।
ये बातें जानना है बेहद जरूरी
यह भ्रम न पालें कि जीरो डेप्रिसिएशन कवर एक्सीडेंट के बाद हर खर्च उठाएगा। आपको 'Compulsory' और 'Voluntary' डिडक्टेबल्स (जो फिक्स्ड होते हैं) तो भरने ही पड़ेंगे। इसके अलावा, यह कवर वेयर एंड टियर (सामान्य घिसावट), मैकेनिकल फेलियर, इलेक्ट्रिकल खराबी या वाटर लॉगिंग (पानी में इंजन खराब होना) को कवर नहीं करता।
उम्र का फैक्टर
ज्यादातर कंपनियां 5 से 7 साल से पुरानी गाड़ियों पर यह कवर नहीं देतीं। जैसे-जैसे आपकी कार पुरानी होती है, इस कवर की उपयोगिता कम होने लगती है। रिन्यूअल के समय अपनी कंपनी से इसकी कट-ऑफ डेट जरूर चेक करें।
फैसला लेने से पहले क्या देखें?
मार्केटिंग के झांसे में आने से पहले यह जरूर देखें कि कौन से पार्ट्स कवर नहीं हैं और साल में कुल कितने क्लेम (आमतौर पर 2) की अनुमति है। इसे एक रिस्क-मैनेजमेंट टूल की तरह इस्तेमाल करें, न कि यह मानकर कि यह हर तरह के वाहन-संबंधी खर्च को कवर करेगा।
