साल 2026 में ₹15 लाख सालाना कमाने वाले कई खरीदारों को ₹1 करोड़ का होम लोन (Home Loan) मिलना मुश्किल हो रहा है। इसकी मुख्य वजह बैंकों का आय के मुकाबले EMI चुकाने की क्षमता की सीमा है। यह समझना ज़रूरी है कि बैंक आपकी लोन एलिजिबिलिटी (Loan Eligibility) कैसे कैलकुलेट करते हैं, ताकि आप बिना किसी फाइनेंशियल स्ट्रेस के अपने घर खरीदने की प्लानिंग कर सकें।
क्या हुआ?
₹15 लाख की सालाना इनकम वाले लोगों के लिए साल 2026 में ₹1 करोड़ का होम लोन लेना पहले से कहीं ज़्यादा मुश्किल हो गया है। भले ही ₹15 लाख की इनकम अच्छी लगे, लेकिन ज़्यादातर बैंक इस इनकम ब्रैकेट के लिए ₹1 करोड़ के लोन को बहुत ज़्यादा मानते हैं। इसका मुख्य कारण यह है कि लोन की किश्त (EMI) इतनी ज़्यादा है कि यह बैंकों द्वारा तय की गई सुरक्षित लोन चुकाने की सीमा को पार कर जाती है।
रिजेक्शन के पीछे का गणित
समस्या को समझने के लिए, मंथली नंबर्स पर नज़र डालते हैं। ₹15 लाख की सालाना इनकम का मतलब है लगभग ₹1.25 लाख ग्रॉस मंथली इनकम। इनकम टैक्स और प्रॉविडेंट फंड जैसे डिडक्शंस (Deductions) के बाद, हाथ में आने वाली इनकम (Take-home pay) अक्सर ₹90,000 से ₹1.05 लाख के बीच रह जाती है।
8.5% की ब्याज दर पर 30 साल के टेनर (Tenure) के लिए ₹1 करोड़ के लोन की EMI लगभग ₹76,900 बनती है। जब आप इस EMI की तुलना ₹1 लाख के मंथली टेक-होम पे से करते हैं, तो अकेले लोन की किश्त ही आपकी उपलब्ध आय का 75% से ज़्यादा खा जाती है। बैंक ऐसे लोन को मंज़ूर करने से कतराते हैं जहाँ मंथली रिपेमेंट उनकी तय सीमा से ज़्यादा हो, क्योंकि इससे खरीदार के पास रोज़मर्रा के खर्चों और अचानक आने वाले खर्चों के लिए बहुत कम पैसा बचता है।
बैंक FOIR को क्यों देखते हैं?
फाइनेंशियल इंस्टिट्यूशंस (Financial Institutions) एक ज़रूरी मीट्रिक का इस्तेमाल करते हैं जिसे फिक्स्ड ऑब्लिगेशन टू इनकम रेशियो (FOIR) कहते हैं। यह आपकी मंथली इनकम का वह प्रतिशत दिखाता है जो आप कर्ज़ चुकाने में खर्च करते हैं। लेंडर्स (Lenders) आमतौर पर इस रेशियो को आपकी ग्रॉस मंथली इनकम के 40% से 60% के बीच रखते हैं।
₹1.25 लाख प्रति माह कमाने वाले के लिए, 50% FOIR की सीमा का मतलब है कि बैंक लगभग ₹62,500 की अधिकतम EMI को मंज़ूरी देगा। 8.5% पर ₹1 करोड़ के लोन के लिए ₹76,900 की EMI की ज़रूरत होती है, जो इस थ्रेशोल्ड (Threshold) से काफी ज़्यादा है। जब तक आवेदक के पास आय का कोई दूसरा सोर्स (Source) न हो या कोई सह-आवेदक (Co-borrower) न हो, बैंक इस लोन को डिफॉल्ट (Default) का हाई रिस्क मानते हैं।
खरीदार अक्सर इन तरीकों पर विचार करते हैं
जिन खरीदारों को इन दिक्कतों का सामना करना पड़ता है, वे अक्सर अपनी लोन मंज़ूरी की संभावनाओं को बेहतर बनाने के लिए कुछ तरीके आजमाते हैं। एक आम तरीका है एप्लीकेशन में सह-आवेदक, जैसे जीवनसाथी, को जोड़ना। मिली-जुली आय से कुल मासिक घरेलू आय बढ़ जाती है, जिससे समग्र FOIR कम हो जाता है और बैंक की नज़र में लोन चुकाना ज़्यादा आसान हो जाता है।
एक और तरीका है डाउन पेमेंट (Down Payment) बढ़ाना। अपनी पर्सनल सेविंग्स (Savings) से ज़्यादा अमाउंट देकर, ज़रूरी लोन की कुल राशि कम हो जाती है। कम लोन राशि का मतलब स्वाभाविक रूप से कम EMI होती है, जिससे रिपेमेंट बैंक की स्वीकार्य FOIR रेंज में आ जाता है। खरीदार अक्सर अपना क्रेडिट स्कोर (Credit Score), जिसे सिबिल स्कोर (CIBIL Score) भी कहते हैं, को बेहतर बनाए रखने पर भी ध्यान देते हैं, जो लेंडर्स से थोड़े बेहतर इंटरेस्ट रेट्स (Interest Rates) दिलाने में मदद कर सकता है।
बजट को बढ़ाने का जोखिम
यह याद रखना ज़रूरी है कि सिर्फ इसलिए कि बैंक लोन मंज़ूर कर सकता है, इसका मतलब यह नहीं है कि यह हमेशा सही फाइनेंशियल फैसला हो। एक ऐसा लोन लेना जो आपकी मंथली इनकम का बड़ा हिस्सा खा जाए, गंभीर फाइनेंशियल स्ट्रेस (Financial Stress) पैदा कर सकता है। अगर इंटरेस्ट रेट्स बढ़ते हैं या अचानक आय का नुकसान होता है, तो ज़्यादा लोन वाले खरीदार को किश्त चुकाने में मुश्किल हो सकती है। फाइनेंशियल प्लानर्स (Financial Planners) आमतौर पर सलाह देते हैं कि लॉन्ग-टर्म फाइनेंशियल स्टेबिलिटी (Financial Stability) सुनिश्चित करने के लिए होम लोन EMI आपकी नेट मंथली इनकम के 30% से 40% से ज़्यादा नहीं होनी चाहिए।
आपको क्या ट्रैक करना चाहिए?
अगर आप होम लोन के लिए अप्लाई करने की सोच रहे हैं, तो कुछ ज़रूरी बातों पर ध्यान दें। अपने वर्तमान क्रेडिट स्कोर को ट्रैक करें, क्योंकि यह आपको मिलने वाले इंटरेस्ट रेट को प्रभावित करता है। अपने मौजूदा डेट ऑब्लिगेशन्स (Debt Obligations), जैसे कार लोन या पर्सनल लोन, पर नज़र रखें, क्योंकि ये सीधे तौर पर आपकी होम लोन लेने की क्षमता को कम करते हैं। आखिर में, इंटरेस्ट रेट्स के ट्रेंड्स (Trends) पर भी नज़र रखें, क्योंकि सेंट्रल बैंक की पॉलिसी (Policy) में बदलाव नए खरीदारों के लिए EMI के गणित को बदल सकता है।
