भारत में हर साल **10-12%** की दर से बढ़ रही पढ़ाई की फीस! क्या आपका सेविंग प्लान पूरा पड़ेगा? जानें महंगाई और सही निवेश का गणित।
क्या है माजरा?
भारत में बच्चों की पढ़ाई का खर्च हर साल 10-12% की रफ्तार से बढ़ रहा है, जो कि आम महंगाई दर से कहीं ज़्यादा है। इसका मतलब है कि हर 6 से 7 साल में एजुकेशन का खर्च दोगुना हो सकता है। फाइनेंशियल एक्सपर्ट्स का कहना है कि ज़्यादातर पेरेंट्स अपने बच्चों की पढ़ाई के लिए आज की फीस के हिसाब से टारगेट सेट करते हैं, लेकिन जब बच्चे कॉलेज जाने लायक होते हैं, तब फंड की भारी कमी रह जाती है। उदाहरण के लिए, आज ₹40 लाख की डिग्री 15 साल बाद ₹2 करोड़ या उससे भी ज़्यादा की हो सकती है।
महंगाई का जाल
निवेशक अक्सर एक बड़ी गलती करते हैं - वे एजुकेशन इन्फ्लेशन (महंगाई) को आम घरेलू महंगाई जैसा मान लेते हैं। रोज़मर्रा की चीज़ों की कीमतें भले ही धीरे-धीरे बढ़ें, लेकिन प्राइवेट इंजीनियरिंग, मेडिकल या टॉप मैनेजमेंट कोर्स जैसी खास पढ़ाई का खर्च तेज़ी से बढ़ता है। अगर कोई पेरेंट ₹40 लाख का लक्ष्य लेकर चल रहा है, जबकि असल में ₹2 करोड़ की ज़रूरत होगी, तो उनका सेविंग प्लान फेल हो जाएगा। इससे आखिर में भारी-भरकम एजुकेशन लोन का बोझ उठाना पड़ सकता है।
इन्वेस्टमेंट के विकल्प
एजुकेशन इन्फ्लेशन को मात देने के लिए, आपके पैसे को इसी दर से या उससे ज़्यादा बढ़कर ग्रो करना होगा। इक्विटी म्यूचुअल फंड्स (Equity Mutual Funds) को अक्सर इसलिए चुना जाता है क्योंकि इनमें लंबे समय में महंगाई को मात देने वाली रिटर्न देने की क्षमता होती है। हालांकि, इनमें मार्केट का रिस्क भी जुड़ा होता है। जो निवेशक इसे चुनते हैं, उन्हें अनुशासित रहना होगा, क्योंकि बाज़ार गिरने पर निवेश रोकना या निकाल लेना कंपाउंडिंग (Compounding) के फायदे को खत्म कर सकता है, जो लॉन्ग-टर्म लक्ष्यों के लिए ज़रूरी है।
लड़कियों के लिए सुकन्या समृद्धि योजना (SSY) और पब्लिक प्रोविडेंट फंड (PPF) जैसे दूसरे विकल्प भी हैं, जो सुरक्षा और टैक्स बेनिफिट्स देते हैं। ये सरकारी योजनाएं हैं, इसलिए इनमें रिस्क कम होता है, लेकिन इनकी ब्याज दरें अक्सर एजुकेशन सेक्टर में देखी जाने वाली हाई इन्फ्लेशन से पीछे रह जाती हैं। ये सेविंग का एक सुरक्षित हिस्सा बनाने के लिए अच्छे हैं, लेकिन महंगी और हाई-क्लास एजुकेशन का पूरा खर्च उठाने के लिए अकेले काफी नहीं हो सकते हैं। बच्चों के लिए NPS Vatsalya भी एक विकल्प है, लेकिन पेरेंट्स को इसके विद्ड्रॉल (Withdrawal) नियमों और लॉन्ग-टर्म लॉक-इन (Lock-in) फीचर्स के बारे में पता होना चाहिए।
छुपे हुए रिस्क
बच्चों की पढ़ाई के लिए फाइनेंशियल प्लानिंग (Financial Planning) सिर्फ इन्वेस्टमेंट प्रोडक्ट चुनने तक ही सीमित नहीं है। दो बड़े रिस्क हैं जिन पर अक्सर ध्यान नहीं दिया जाता। पहला, अगर पेरेंट्स अपने बच्चे की पढ़ाई विदेश में कराने की सोच रहे हैं, तो करेंसी रिस्क (Currency Risk) है। अगर इंडियन रुपया अमेरिकी डॉलर जैसी विदेशी करेंसी के मुकाबले कमजोर होता है, तो असल खर्च एजुकेशन इन्फ्लेशन से भी ज़्यादा बढ़ जाएगा। दूसरा, कमाने वाले पेरेंट की अचानक अनुपस्थिति का रिस्क। अगर मुख्य कमाने वाले व्यक्ति का अप्रत्याशित रूप से निधन हो जाता है, तो एजुकेशन सेविंग प्लान रुक सकता है। इसीलिए फाइनेंशियल प्लानर्स किसी भी इन्वेस्टमेंट स्ट्रैटेजी के साथ एक टर्म लाइफ इंश्योरेंस पॉलिसी (Term Life Insurance Policy) लेने की सलाह देते हैं, जो एजुकेशन गोल के खर्च को कवर करे।
निवेशकों को क्या समझना चाहिए?
निवेशक अक्सर इस जानकारी को अपने मौजूदा सेविंग कॉर्पस (Savings Corpus) का फिर से मूल्यांकन करने के संकेत के रूप में देखते हैं। अगर लक्ष्य 10 या 15 साल दूर है, तो फोकस शॉर्ट-टर्म सेफ्टी से लॉन्ग-टर्म ग्रोथ की ओर शिफ्ट करने की ज़रूरत हो सकती है। सबसे ज़रूरी चीज़ है कि बच्चे जिस कोर्स को करना चाहते हैं, उसकी इन्फ्लेशन रेट पर नज़र रखी जाए। पेरेंट्स को यह जांचना चाहिए कि क्या उनकी मौजूदा मंथली सेविंग्स, जैसे कि SIP (Systematic Investment Plan) के ज़रिए, इन बढ़ते खर्चों के साथ तालमेल बिठाने के लिए समय-समय पर बढ़ाई जा रही हैं। यह स्ट्रैटेजी सरकारी योजनाओं की सुरक्षा और मार्केट-लिंक्ड इन्वेस्टमेंट्स की ग्रोथ क्षमता के बीच एक संतुलन बनाने की कोशिश रहती है।
