भारत में नौकरीपेशा लोगों के लिए रिटायरमेंट प्लानिंग में VPF (वॉलंटरी प्रोविडेंट फंड) और NPS (नेशनल पेंशन सिस्टम) के बीच चुनाव करना एक अहम फैसला है। VPF गारंटीड रिटर्न देता है, जबकि NPS मार्केट-लिंक्ड ग्रोथ और टैक्स फायदे के साथ आता है।
रिटायरमेंट के लिए सही प्लानिंग: VPF या NPS?
रिटायरमेंट के लिए एक बड़ा फंड बनाने के लिए सही साधनों को चुनना बहुत ज़रूरी है। भारत में कई नौकरीपेशा लोगों के लिए, यह चुनाव अक्सर दो सरकारी-समर्थित रिटायरमेंट विकल्पों के बीच होता है: वॉलंटरी प्रोविडेंट फंड (VPF) और नेशनल पेंशन सिस्टम (NPS)।
VPF: स्थिरता और गारंटीड रिटर्न का भरोसा
VPF असल में एम्प्लॉइज प्रोविडेंट फंड (EPF) का ही एक वॉलंटरी एक्सटेंशन है। यह कर्मचारियों को अनिवार्य EPF राशि से ज़्यादा योगदान करने की अनुमति देता है, जिस पर EPF की तरह ही सरकारी ब्याज दर मिलती है, जो फिलहाल 8.25% प्रति वर्ष है। जो लोग पूंजी की स्थिरता पसंद करते हैं, उनके लिए VPF बहुत आकर्षक है क्योंकि इसका रिटर्न गारंटीड होता है और शेयर बाजार के उतार-चढ़ाव से सुरक्षित रहता है।
हालांकि, यह ध्यान रखना ज़रूरी है कि VPF योगदान सेक्शन 80C के तहत ₹1.5 लाख की टैक्स डिडक्शन लिमिट में ही गिना जाता है। इसके अलावा, फाइनेंशियल ईयर में ₹2.5 लाख से ज़्यादा के कर्मचारी योगदान पर मिलने वाला ब्याज टैक्सेबल (Taxable) है।
NPS: मार्केट-लिंक्ड ग्रोथ और अतिरिक्त टैक्स फायदे
वहीं, नेशनल पेंशन सिस्टम (NPS) पेंशन फंड रेगुलेटरी एंड डेवलपमेंट अथॉरिटी (PFRDA) द्वारा रेगुलेट किया जाने वाला एक मार्केट-लिंक्ड प्रोडक्ट है। VPF के फिक्स्ड-इनकम (Fixed-Income) नेचर के विपरीत, NPS फंड्स को निवेशक की पसंद के आधार पर इक्विटी (Equity), कॉर्पोरेट बॉन्ड (Corporate Bonds) और सरकारी सिक्योरिटीज (Government Securities) जैसे एसेट्स के मिश्रण में निवेश किया जाता है। यह स्ट्रक्चर मार्केट ग्रोथ में हिस्सेदारी करके लंबी अवधि में वेल्थ क्रिएशन (Wealth Creation) की संभावना को बढ़ाता है।
NPS का एक बड़ा फायदा इसका खास टैक्स बेनिफिट है: योगदानकर्ता सेक्शन 80CCD(1B) के तहत ₹50,000 तक का अतिरिक्त डिडक्शन (Deduction) क्लेम कर सकते हैं, जो स्टैंडर्ड सेक्शन 80C लिमिट के ऊपर है।
2026 में टैक्स रिजीम का असर
2026 में, इन दोनों विकल्पों के बीच का चुनाव काफी हद तक मौजूदा टैक्स रिजीम (Tax Regime) पर निर्भर करेगा। कई सैलरीड लोग न्यू टैक्स रिजीम (New Tax Regime) को अपना रहे हैं, जहां 80C जैसी ज़्यादातर पारंपरिक डिडक्शन्स सीमित हैं। ऐसे में VPF का टैक्स बचाने वाला तर्क कमज़ोर पड़ता है। लेकिन, NPS में एम्प्लॉयर का योगदान (Employer Contributions) सेक्शन 80CCD(2) के तहत टैक्सेबल इनकम को कम करने का एक बहुत ही असरदार तरीका बना हुआ है, जिससे NPS टैक्स प्लानिंग के लिए एक मज़बूत विकल्प बन जाता है।
जोखिम और रणनीतियाँ
दोनों में निहित जोखिमों पर भी विचार करना ज़रूरी है। VPF में इन्फ्लेशन रिस्क (Inflation Risk) है; क्योंकि ब्याज दर फिक्स्ड है, इसलिए लंबी अवधि में यह फंड की परचेजिंग पावर (Purchasing Power) को लिविंग कॉस्ट (Living Cost) के बराबर नहीं बढ़ा सकता है। दूसरी ओर, NPS में मार्केट रिस्क (Market Risk) है, क्योंकि यह अंडरलाइंग एसेट्स (Underlying Assets) के परफॉरमेंस से जुड़ा है। रिटायरमेंट पर NPS में एन्युटी (Annuity) खरीदने के नियम भी हैं, जो व्यक्ति के इनकम स्लैब (Income Slab) के आधार पर टैक्सेबल होते हैं।
अंततः, VPF और NPS दोनों में स्ट्रिक्ट विद्ड्रॉल रूल्स (Withdrawal Rules) हैं, इसलिए इन्हें लिक्विड सेविंग्स अकाउंट (Liquid Savings Account) की तरह नहीं देखा जाना चाहिए। कई लोग दोनों का एक साथ इस्तेमाल करते हैं: VPF को एक स्टेबल, रिस्क-फ्री बेस के लिए और NPS को ग्रोथ के लिए। फैसला लेने से पहले अपनी उम्र, शॉर्ट-टर्म गोल्स (Short-Term Goals) के लिए लिक्विडिटी की ज़रूरतें और रिस्क टॉलरेंस (Risk Tolerance) का आकलन करना महत्वपूर्ण है। किसी भी निवेशक के लिए सबसे ज़रूरी बात यह है कि वे किस टैक्स रिजीम के तहत आते हैं, क्योंकि यही हर योगदान के असली पोस्ट-टैक्स फायदे (Post-Tax Benefit) को तय करेगा।
