ज्यादातर भारतीय निवेशक यह मानकर कई सारी SIPs शुरू कर देते हैं कि इससे डायवर्सिफिकेशन बढ़ेगा। लेकिन असल में, कई फंड्स रखने से आप एक ही तरह के लार्ज-कैप स्टॉक्स में पैसा फंसा बैठते हैं।
भारत के कई रिटेल निवेशक अक्सर अलग-अलग म्यूचुअल फंड हाउस से 5 से 6 तरह की SIPs चुन लेते हैं। उन्हें लगता है कि ऐसा करने से रिस्क कम होगा, लेकिन हकीकत कुछ और ही है। ज्यादा फंड्स होने से पोर्टफोलियो सुरक्षित नहीं होता, बल्कि यह एक गलतफहमी पैदा करता है कि आपका पैसा अलग-अलग जगह लगा है, जबकि वह अक्सर एक ही तरह के स्टॉक्स में सिमट कर रह जाता है।
लार्ज-कैप ओवरलैप की समस्या
इस समस्या की मुख्य वजह रेगुलेटरी फ्रेमवर्क है। SEBI के नियमों के मुताबिक, लार्ज-कैप फंड्स को अपनी कुल संपत्ति का कम से कम 80% हिस्सा टॉप 100 कंपनियों में लगाना होता है। चूंकि ज्यादातर फंड हाउस उन्हीं टॉप कंपनियों पर दांव लगा रहे हैं, इसलिए आपके पास मौजूद तीन अलग-अलग लार्ज-कैप फंड्स भी अंत में एक ही जैसे स्टॉक्स खरीद रहे होते हैं। नतीजतन, आप असली डायवर्सिफिकेशन का फायदा नहीं उठा पाते।
होल्डिंग्स की पहचान कैसे करें?
सिर्फ फंड के नाम देखकर फैसला न लें, बल्कि उसकी असल होल्डिंग्स चेक करें। SEBI की गाइडलाइंस के अनुसार, हर म्यूचुअल फंड कंपनी को महीने में अपना पोर्टफोलियो डिस्क्लोज करना पड़ता है। आप उनकी वेबसाइट पर जाकर यह देख सकते हैं कि आपके फंड्स कहां निवेश कर रहे हैं। सेक्टर कंसंट्रेशन पर भी नजर रखें—अगर आपके अलग-अलग फंड्स सिर्फ फाइनेंशियल या टेक सेक्टर में ही पैसा लगा रहे हैं, तो आप मार्केट के एक ही झटके के प्रति असुरक्षित हो सकते हैं।
पोर्टफोलियो कंसोलिडेशन की रणनीति
अगर आपको अपने पोर्टफोलियो में ओवरलैप दिखता है, तो तुरंत सब कुछ बेचने की जरूरत नहीं है। जल्दबाजी में यूनिट्स बेचने पर एग्जिट लोड और कैपिटल गेन्स टैक्स लग सकता है। बेहतर तरीका यह है कि आप गैर-जरूरी फंड्स में SIP बंद कर दें और उस रकम को अपने पसंदीदा फंड्स में डायवर्ट कर दें।
अगली रणनीति क्या हो?
असली डायवर्सिफिकेशन का मतलब है एसेट क्लास का सही मिश्रण—जैसे इक्विटी के साथ डेट फंड्स का तालमेल। अगली बार अपने इन्वेस्टमेंट स्टेटमेंट को देखते समय यह न देखें कि कितनी SIPs चल रही हैं, बल्कि यह देखें कि आपका पैसा किन कंपनियों में निवेशित है।
