क्रेडिट कार्ड यूजर्स अक्सर तुरंत कैश फ्लो मैनेज करने के लिए मिनिमम पेमेंट का विकल्प चुनते हैं। लेकिन, यह तरीका आपको कर्ज के जाल में फंसा सकता है। हाई एनुअल इंटरेस्ट रेट्स के कारण, बाकी बचे अमाउंट पर ब्याज तेजी से बढ़ता है, जिससे आपकी खरीदारी काफी महंगी हो जाती है।
मिनिमम पेमेंट का खेल
क्रेडिट कार्ड कंपनियां ग्राहकों को कुल बिल का एक छोटा प्रतिशत, जिसे 'मिनिमम अमाउंट ड्यू' कहा जाता है, चुकाने की सुविधा देती हैं। यह आपको लेट पेमेंट फीस और जुर्माने से तो बचा लेता है, लेकिन बाकी बचे हुए अमाउंट पर ब्याज लगना बंद नहीं होता। बहुत से लोग इसे पेमेंट टालने का आसान तरीका समझते हैं, लेकिन उन्हें पता नहीं होता कि इससे उनके क्रेडिट कार्ड का कर्ज मूल रूप से बदल जाता है।
ब्याज का छिपा हुआ गणित
जब आप सिर्फ मिनिमम पेमेंट करते हैं, तो बकाया राशि पर कार्ड के एनुअल परसेंटेज रेट (APR) के हिसाब से ब्याज लगना शुरू हो जाता है। भारत में क्रेडिट कार्ड इंटरेस्ट रेट्स आमतौर पर 36% से 48% प्रति वर्ष तक होते हैं। चूंकि क्रेडिट कार्ड का ब्याज हर दिन कैलकुलेट होता है और कंपाउंड होता है, इसलिए कर्ज की लागत तेजी से बढ़ती है। जो पेमेंट छोटी लगती है, वो असल में खरीदी गई चीजों की कुल लागत को काफी बढ़ा देती है।
इंटरेस्ट-फ्री ग्रेस पीरियड का नुकसान
क्रेडिट कार्ड यूजर्स के लिए एक बड़ा खतरा इंटरेस्ट-फ्री ग्रेस पीरियड (ब्याज-मुक्त अवधि) का खत्म हो जाना है। आमतौर पर क्रेडिट कार्ड पर 20 से 50 दिनों तक की एक अवधि मिलती है, जिसमें नई खरीद पर कोई ब्याज नहीं लगता, बशर्ते कि पिछला पूरा बकाया चुका दिया गया हो। लेकिन, जैसे ही आप मिनिमम पेमेंट करना शुरू करते हैं, आप 'रिवॉल्विंग क्रेडिट' साइकिल में आ जाते हैं। ऐसे में, इंटरेस्ट-फ्री ग्रेस पीरियड खत्म हो जाता है। नतीजतन, उसी दिन से की गई हर नई खरीद पर ब्याज लगना शुरू हो जाता है, जिससे आपकी नई खरीदारी की लागत बढ़ जाती है।
कर्जदारों के लिए बड़े फाइनेंशियल रिस्क
कर्जदारों के लिए सबसे बड़ा खतरा 'डेट स्पाइरल' यानी कर्ज का मकड़जाल है। अगर कोई व्यक्ति पिछले महीने के बकाया को चुकाए बिना कार्ड से नई खरीदारी जारी रखता है, तो पुराने कर्ज और नई खरीद, दोनों पर ब्याज जमा होता जाता है। इससे कुल बकाया राशि को कम करना बेहद मुश्किल हो जाता है। मिनिमम पेमेंट अक्सर सिर्फ ब्याज और मूलधन (प्रिंसिपल) के एक छोटे से हिस्से को कवर करने के लिए ही डिजाइन किया जाता है, जिसका मतलब है कि कुल कर्ज बहुत धीरे-धीरे कम होता है।
कर्जदारों को क्या ध्यान रखना चाहिए?
क्रेडिट कार्ड मैनेज करने वालों के लिए, मिनिमम ड्यू अमाउंट से ज्यादा महत्वपूर्ण 'टोटल स्टेटमेंट बैलेंस' पर नजर रखना है। फाइनेंशियल डिसिप्लिन का मतलब है कि आप अपनी कुल मंथली खर्च को अपनी चुकाने की क्षमता के भीतर रखें। अपने कार्ड पर लागू होने वाले इंटरेस्ट रेट को वेरिफाई करना भी जरूरी है, क्योंकि ये रेट्स रिटेल क्रेडिट के सबसे महंगे रूपों में से हैं। स्टेटमेंट को नियमित रूप से चेक करके यह देखना कि कितना ब्याज लग रहा है, यह समझने में मदद करता है कि यह उधार लेने का तरीका लंबे समय में कितना महंगा साबित हो सकता है।
