विरासत में मिले शेयर्स का ट्रांसफर तो टैक्स-फ्री है, लेकिन इन्हें बेचने पर कैपिटल गेंस टैक्स देना होगा। निवेशकों को पुराने मालिक की खरीद लागत या **31 जनवरी 2018** की वैल्यू के आधार पर कॉस्ट बेसिस तय करना होगा, और अब **₹1.25 लाख** से ज्यादा के लॉन्ग-टर्म प्रॉफिट पर **12.5%** टैक्स लगेगा, जिसमें इंडेक्सेशन का फायदा नहीं मिलेगा।
टैक्स के नियम और विरासत
इनकम टैक्स एक्ट के तहत विरासत में शेयर मिलना कोई टैक्सेबल इवेंट नहीं है, लेकिन जब उत्तराधिकारी (successor) इन शेयर्स को बेचता है, तो टैक्स की गणना शुरू होती है। कैपिटल गेंस टैक्स के लिए सबसे जरूरी है 'कॉस्ट ऑफ एक्विजिशन' (Cost of Acquisition) को समझना, जो कि उस मूल कीमत के बराबर होती है जिस पर ओरिजिनल ओनर ने शेयर्स खरीदे थे।
कॉस्ट बेसिस कैसे तय करें?
विरासत को नई खरीद नहीं माना जाता, इसलिए कॉस्ट बेसिस वही रहेगी जो ओरिजिनल ओनर की थी। यदि शेयर्स 1 अप्रैल 2001 से पहले खरीदे गए थे, तो टैक्सपेयर्स Fair Market Value (FMV) का इस्तेमाल कर सकते हैं। वहीं, 2018 के यूनियन बजट के 'ग्रैंडफादरिंग नियम' के अनुसार, यदि शेयर 1 फरवरी 2018 से पहले खरीदे गए थे, तो निवेशक 31 जनवरी 2018 की क्लोजिंग प्राइस को अपनी लागत मान सकते हैं। निवेशकों को सलाह है कि वे अपने पास पुराने कॉन्ट्रैक्ट नोट्स सुरक्षित रखें ताकि टैक्स विभाग के सामने सटीक दावे पेश किए जा सकें।
टैक्स रेट और इंडेक्सेशन का गणित
ध्यान रखें कि शेयर्स की होल्डिंग पीरियड कैलकुलेट करते समय ओरिजिनल ओनर के समय को भी जोड़ा जाता है। यह तय करता है कि शेयर लॉन्ग-टर्म कैपिटल एसेट है या नहीं। आज के नियमों के अनुसार, ₹1.25 लाख से ऊपर के लॉन्ग-टर्म कैपिटल गेन पर 12.5% की फ्लैट रेट से टैक्स लगता है। सबसे बड़ा बदलाव यह है कि अब इंडेक्सेशन (मुद्रास्फीति के हिसाब से खरीद लागत बढ़ाना) का लाभ पूरी तरह खत्म कर दिया गया है। यदि आपके पास ओरिजिनल खरीद की कीमत का रिकॉर्ड नहीं है, तो टैक्स अधिकारी इसे शून्य (Nil) मान सकते हैं, जिससे आपका टैक्स बोझ काफी बढ़ सकता है।
