अगर आपको लगता है कि कंपनी के डीलिस्ट (Delisted) होते ही आप कैपिटल लॉस क्लेम कर सकते हैं, तो आप गलत हैं। इनकम टैक्स एक्ट के मुताबिक, सिर्फ डीलिस्टिंग टैक्सेबल इवेंट नहीं है। जब तक शेयर बेचे नहीं जाते, आप लॉस नहीं दिखा सकते।
अक्सर निवेशक यह मान लेते हैं कि जैसे ही कोई कंपनी स्टॉक एक्सचेंज से डीलिस्ट होती है, तो उसके शेयरों की वैल्यू घटने या लिक्विडिटी खत्म होने पर वे तुरंत कैपिटल लॉस का क्लेम कर सकते हैं। भारतीय टैक्स नियमों के तहत यह एक बड़ी गलतफहमी है, जो आपको इनकम टैक्स विभाग की जांच के घेरे में ला सकती है। कानून की नजर में, कंपनी का पब्लिक से प्राइवेट होना 'ट्रांसफर' या 'एसेट का खत्म होना' नहीं माना जाता है। जब तक शेयर आपके डीमैट अकाउंट में हैं, आप उसके मालिक बने रहते हैं।
टैक्स का 'ट्रेगर' पॉइंट क्या है?
कानूनी तौर पर कैपिटल लॉस क्लेम करने के लिए एसेट का आपके हाथ से निकलना जरूरी है। इसके लिए कुछ खास तरीके हैं:
- ऑफ-मार्केट सेल: किसी प्राइवेट बायर को शेयर बेचकर ट्रांजैक्शन पूरा करना।
- एग्जिट ऑफर: कंपनी द्वारा लाए गए बायबैक या एग्जिट स्कीम में हिस्सा लेना।
- लिक्विडेशन: यदि कंपनी बंद हो रही है और शेयर कानूनी रूप से खत्म (extinguished) हो गए हैं।
जब तक आप इनमें से कोई कदम नहीं उठाते, आप वैल्यू में आई गिरावट को दूसरे कैपिटल गेन्स के सामने एडजस्ट नहीं कर सकते।
अनलिस्टेड एसेट के नियम और होल्डिंग पीरियड
डीलिस्टिंग के बाद शेयरों का स्टेटस बदल जाता है। लिस्टेड शेयरों के लिए लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन्स (LTCG) की अवधि 12 महीने होती है, लेकिन डीलिस्ट होने के बाद ये 'अनलिस्टेड एसेट' बन जाते हैं। अब इन पर लॉन्ग टर्म का फायदा पाने के लिए आपको 24 महीने तक होल्ड करना होगा। टैक्स कैलकुलेशन करते समय इस बदलाव का ध्यान रखना बेहद जरूरी है।
ITR फाइलिंग और ऑडिट का रिस्क
गलत तरीके से लॉस रिपोर्ट करना भारी पड़ सकता है। आपको अपनी ITR में अनलिस्टेड शेयरों की होल्डिंग का खुलासा करना अनिवार्य है। यदि आप बिना वैध ट्रांसफर के लॉस दिखाते हैं, तो ऑडिट के दौरान विभाग इसे खारिज कर सकता है। याद रखें, लॉस को अगले साल के लिए कैरी फॉरवर्ड करने के लिए तय समय सीमा के भीतर ITR फाइल करना जरूरी है। अपने पास खरीद के दस्तावेज और एग्जिट ऑफर के सबूत संभाल कर रखें, ताकि भविष्य में कोई परेशानी न हो।
