विरासत में मिले गोल्ड ज्वेलरी का मिलना टैक्स-फ्री है, लेकिन इसे बेचने पर आपको कैपिटल गेन्स टैक्स देना होगा। मुनाफे की कैलकुलेशन पुराने मालिक के होल्डिंग पीरियड के आधार पर होती है और बिना बिल के भी आप फेयर मार्केट वैल्यू का उपयोग कर सकते हैं।
विरासत में मिला सोना बेचना एक बड़ा वित्तीय फैसला है, लेकिन इसके साथ टैक्स की पेचीदगियां भी जुड़ी हैं। इनकम टैक्स एक्ट के तहत विरासत में मिली ज्वेलरी का मिलना तो टैक्स-फ्री है, लेकिन जब आप इसे बेचते हैं, तो सरकार इसे कैपिटल एसेट का ट्रांसफर मानती है। ऐसे में आपको कैपिटल गेन्स टैक्स देना पड़ सकता है।\n\n### होल्डिंग पीरियड कैसे तय करें?\n\nटैक्स की दर इस पर निर्भर करती है कि आपने (और पिछले मालिक ने) इसे कितने समय तक अपने पास रखा। कानून के अनुसार, आप पिछले मालिक के होल्डिंग पीरियड को अपने समय के साथ जोड़ सकते हैं। यदि यह कुल अवधि 24 महीने से ज्यादा है, तो इसे लॉन्ग-टर्म कैपिटल एसेट माना जाता है। इस पर आपको बिना इंडेक्सेशन के 12.5% की फ्लैट दर से टैक्स देना होगा। वहीं, 24 महीने से कम समय के लिए इसे शॉर्ट-टर्म गेन्स माना जाएगा और टैक्स आपके इनकम स्लैब के अनुसार लगेगा।\n\n### अगर पुराने बिल न हों तो क्या करें?\n\nअक्सर परिवारों में पुरानी ज्वेलरी के बिल नहीं होते। ऐसी स्थिति में इनकम टैक्स डिपार्टमेंट आपको 'फेयर मार्केट वैल्यू' (FMV) का उपयोग करने की अनुमति देता है। अगर सोना 1 अप्रैल 2001 से पहले का है, तो आप उस तारीख की FMV को ही खरीद लागत मान सकते हैं। इससे आपका कैपिटल गेन कम हो सकता है। किसी प्रोफेशनल वैल्यूअर से इसकी रिपोर्ट तैयार करवाना और उसे संभाल कर रखना बहुत जरूरी है, ताकि भविष्य में टैक्स असेसमेंट के दौरान कोई समस्या न हो।\n\n### टैक्स बचाने के उपाय\n\nटैक्स के बोझ को कम करने के लिए इनकम टैक्स एक्ट का सेक्शन 54F एक बेहतर विकल्प हो सकता है। अगर आप गोल्ड बेचने से मिली रकम को भारत में किसी रेजिडेंशियल प्रॉपर्टी में निवेश करते हैं, तो आप कैपिटल गेन्स टैक्स में छूट का दावा कर सकते हैं। हालांकि, इसके लिए सख्त समय-सीमा और पात्रता के नियम हैं। टैक्स एक्सपर्ट्स का यही कहना है कि किसी भी ट्रांजैक्शन से पहले सभी दस्तावेज जुटाएं और सावधानी से गणना करें।
