यूनियन बजट 2026 का STT पर बड़ा फैसला
यूनियन बजट 2026 में लिए गए फैसलों का असर अब बाजार पर दिखने लगा है। सरकार द्वारा सिक्योरिटीज ट्रांजैक्शन टैक्स (STT) में की गई बढ़ोत्तरी ने आर्बिट्राज फंड्स (Arbitrage Funds) के लिए बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं।
STT बढ़ोत्तरी से आर्बिट्राज फंड्स के मार्जिन पर चोट
यह बढ़ोत्तरी आर्बिट्राज स्ट्रैटेजी की मुनाफे वाली क्षमता पर सीधा असर डाल रही है। फ्यूचर्स ट्रांजैक्शन पर STT को 0.02% से बढ़ाकर 0.05% कर दिया गया है, जबकि ऑप्शंस प्रीमियम पर यह 0.1% से बढ़कर 0.15% हो गया है। आर्बिट्राज फंड्स, जो कैश और फ्यूचर्स मार्केट के बीच प्राइस डिफरेंस का फायदा उठाने के लिए हाई-फ्रीक्वेंसी ट्रेडिंग पर निर्भर करते हैं, उनके ऑपरेशनल कॉस्ट में भारी इजाफा हुआ है। पहले जो सालाना रिटर्न निवेशकों को आकर्षित करते थे, अब वो दबाव में हैं और कई फंड्स के नेट यील्ड (Net Yield) में कमी आने की आशंका है।
लिक्विड फंड्स: स्थिरता का सहारा
ऐसे में, लिक्विड फंड्स (Liquid Funds), जो डेट म्यूचुअल फंड्स (Debt Mutual Funds) का एक हिस्सा हैं, एक बार फिर निवेशकों की पहली पसंद बनने लगे हैं। ये फंड्स 91 दिनों तक की मैच्योरिटी वाले बहुत लिक्विड मनी मार्केट इंस्ट्रूमेंट्स (Money Market Instruments) में निवेश करते हैं। इनका मुख्य फोकस कैपिटल प्रिजर्वेशन (Capital Preservation) पर होता है और इनमें क्रेडिट रिस्क (Credit Risk) भी बहुत कम होता है। यही वजह है कि ये इक्विटी ट्रांजैक्शन टैक्स में बदलावों से ज्यादा प्रभावित नहीं होते।
लिक्विड फंड्स का प्रदर्शन और तुलना
फरवरी 2026 की शुरुआत तक के आंकड़े देखें तो लिक्विड फंड्स ने लगातार अच्छा प्रदर्शन किया है। इन्होंने पिछले 6 महीनों में करीब 2.9% और 1 साल में लगभग 6.4% का एब्सोल्यूट रिटर्न (Absolute Return) दिया है। इनका स्टैंडर्ड डेविएशन (Standard Deviation) भी महज 0.2% है और शार्प रेशियो (Sharpe Ratio) 3.57 है, जो आर्बिट्राज फंड्स की तुलना में काफी बेहतर स्थिति दर्शाते हैं।
अन्य शॉर्ट-टर्म विकल्पों की बात करें तो, मनी मार्केट फंड्स (Money Market Funds) ने फरवरी 2026 तक करीब 6.8% का 1-साल का रिटर्न दिखाया है। वहीं, बैंकों के शॉर्ट-टर्म फिक्स्ड डिपॉजिट (Fixed Deposits) पर 6 महीने से 1 साल की अवधि के लिए 5.8% से 7.2% तक का गारंटीड रिटर्न मिल रहा है, हालांकि इन पर निवेशक के इनकम टैक्स स्लैब के अनुसार टैक्स लगता है। STT बढ़ोत्तरी के बाद आर्बिट्राज फंड्स के नेट पोस्ट-टैक्स रिटर्न इन विकल्पों से कम आकर्षक हो सकते हैं।
टैक्स समीकरण में बदलाव
टैक्सेशन (Taxation) हमेशा से एक बड़ा फैक्टर रहा है, लेकिन STT की बढ़ोत्तरी ने इस समीकरण को बदल दिया है। आर्बिट्राज फंड्स, जिन्हें इक्विटी-ओरिएंटेड हाइब्रिड (Equity-Oriented Hybrid) माना जाता है, पर ₹1.25 लाख सालाना की सीमा से ऊपर शॉर्ट-टर्म कैपिटल गेन्स (STCG) पर 20% और लॉन्ग-टर्म कैपिटल गेन्स (LTCG) पर 12.5% टैक्स लगता है। वहीं, डेट-ओरिएंटेड होने के कारण लिक्विड फंड्स पर कैपिटल गेन पर निवेशक के लागू इनकम टैक्स स्लैब के अनुसार टैक्स लगता है। पहले आर्बिट्राज फंड्स का इक्विटी क्लासिफिकेशन हाई-इनकम अर्नर्स के लिए टैक्स का फायदा देता था। लेकिन अब ट्रांजैक्शन कॉस्ट में भारी इजाफे के कारण यह टैक्स एडवांटेज (Tax Advantage) उतना प्रभावी नहीं रह गया है।
आर्बिट्राज फंड्स के लिए चुनौतियाँ
आर्बिट्राज फंड्स का पूरा मॉडल ही प्राइस डिफरेंस से प्रॉफिट कमाने पर टिका है, जो ट्रांजैक्शन कॉस्ट के प्रति बेहद संवेदनशील होता है। STT की बढ़ोत्तरी ने इन खर्चों को सीधे तौर पर बढ़ा दिया है, जिससे आर्बिट्राज स्प्रेड (Arbitrage Spread) खत्म होने का खतरा बढ़ गया है। लिक्विड फंड्स के विपरीत, जो मुख्य रूप से इंटरेस्ट रेट रिस्क (Interest Rate Risk) और मिनिमल क्रेडिट रिस्क से जूझते हैं, आर्बिट्राज फंड्स को बेसिस रिस्क (Basis Risk) और एग्जीक्यूशन रिस्क (Execution Risk) का भी सामना करना पड़ता है, जो बढ़े हुए ट्रेडिंग फी (Trading Fee) से और बढ़ जाते हैं। 2018 में STT में हुई पिछली बढ़ोत्तरी ने भी बाजार में कुछ समय के लिए अस्थिरता पैदा की थी। इसके अलावा, आर्बिट्राज फंड्स में इक्विटी का कंपोनेंट स्टॉक मार्केट की वोलैटिलिटी (Volatility) का रिस्क भी साथ लाता है, जो प्योर डेट इंस्ट्रूमेंट्स में नहीं होता। फाइनेंशियल एनालिटिक्स फर्मों की रिपोर्ट्स का अनुमान है कि STT की बढ़ोत्तरी से आर्बिट्राज फंड्स के नेट सालाना रिटर्न में 30 से 50 बेसिस पॉइंट (Basis Points) की कमी आ सकती है, जो मौजूदा लो-यील्ड एनवायरनमेंट (Low-Yield Environment) में काफी मायने रखता है।
आगे की राह और निवेशकों के लिए सलाह
विश्लेषकों का मानना है कि आर्बिट्राज फंड्स के लिए आगे का रास्ता थोड़ा चुनौतीपूर्ण है। कई ब्रोकरेज फर्म्स निवेशकों को अब कम हुए रिटर्न पोटेंशियल (Return Potential) के मुकाबले कैपिटल प्रिजर्वेशन पर ज्यादा ध्यान देने की सलाह दे रहे हैं। उम्मीद है कि आर्बिट्राज फंड्स के लिए एसेट अंडर मैनेजमेंट (AUM) ग्रोथ धीमी हो सकती है, क्योंकि निवेशक उनके रिस्क-रिवॉर्ड प्रोफाइल (Risk-Reward Profile) का फिर से मूल्यांकन कर रहे हैं।
आरबीआई (RBI) द्वारा 2025 में की गई रेपो रेट (Repo Rate) कट की समीक्षा के बाद, ब्याज दरें स्थिर लेकिन धीमी गति से बढ़ने का माहौल बना हुआ है। यह शॉर्ट-टर्म कैपिटल के लिए प्रेडिक्टेबल रिटर्न (Predictable Return) के महत्व को और बढ़ाता है। इसलिए, निवेशकों को अपनी टैक्स ब्रैकेट, रिस्क टॉलरेंस (Risk Tolerance) और इन्वेस्टमेंट होराइजन (Investment Horizon) को ध्यान में रखते हुए लिक्विड फंड्स की स्थिरता, फिक्स्ड डिपॉजिट की निश्चितता या आर्बिट्राज स्ट्रैटेजी के अब कम निश्चित फायदों के बीच समझदारी से चुनाव करना चाहिए।