SEBI की चेतावनी: सिर्फ EPF पर निर्भर रहना खतरनाक! रिटायरमेंट प्लानिंग पर बड़ा खुलासा

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AuthorMehul Desai|Published at:
SEBI की चेतावनी: सिर्फ EPF पर निर्भर रहना खतरनाक! रिटायरमेंट प्लानिंग पर बड़ा खुलासा

वित्तीय नियामक SEBI और एक्सपर्ट्स ने चेतावनी दी है कि सिर्फ एम्प्लॉइज प्रोविडेंट फंड (EPF) के भरोसे रिटायरमेंट के लिए फंड जुटाना काफी नहीं है। बढ़ती महंगाई, स्वास्थ्य सेवाओं का महंगा होना और लंबी उम्र जैसी वजहों से एक डायवर्सिफाइड इन्वेस्टमेंट स्ट्रैटेजी (diversified investment strategy) की जरूरत है।

EPF पर निर्भरता क्यों पड़ सकती है भारी?

देशभर के लाखों सैलरीड लोगों के लिए एम्प्लॉइज प्रोविडेंट फंड (EPF) रिटायरमेंट प्लानिंग का एक अहम हिस्सा है। लेकिन, फाइनेंशियल रेगुलेटर SEBI और एक्सपर्ट्स बार-बार आगाह कर रहे हैं कि EPF को रिटायरमेंट का अकेला सहारा मानना भविष्य में एक बड़ी चूक साबित हो सकता है।

EPF जहां एक सुरक्षित और स्थिर बेस देता है, वहीं लंबे रिटायरमेंट पीरियड में बढ़ती महंगाई का सामना करने के लिए इसमें ज़रूरी ग्रोथ पोटेंशियल (growth potential) की कमी देखी जाती है।

महंगाई और लंबी उम्र का डबल अटैक

सिर्फ एक फिक्स्ड-इनकम इंस्ट्रूमेंट (fixed-income instrument) पर निर्भर रहने का सबसे बड़ा खतरा है कि समय के साथ पैसे की परचेजिंग पावर (purchasing power) कम हो जाती है। आज जो रकम बड़ी लग रही है, वो 15-20 साल बाद शायद कम पड़ जाए।

इसके अलावा, मेडिकल साइंस में तरक्की और बेहतर लाइफस्टाइल के चलते लोगों की उम्र बढ़ रही है। यानी, रिटायरमेंट के बाद का जीवन सिर्फ 10 साल नहीं, बल्कि 20 साल या उससे भी ज्यादा लंबा हो सकता है। ऐसे में, पारंपरिक सेविंग स्कीम्स से जुटाया गया कॉर्पस (corpus) कम पड़ सकता है।

डायवर्सिफिकेशन क्यों है ज़रूरी?

एक्सपर्ट्स का मानना है कि एक मजबूत रिटायरमेंट प्लान सिर्फ एक एसेट क्लास (asset class) पर टिका नहीं होना चाहिए। EPF मुख्य रूप से एक डेट-बेस्ड, फिक्स्ड-रिटर्न इंस्ट्रूमेंट है। यह सुरक्षा तो देता है, लेकिन इक्विटी-लिंक्ड इन्वेस्टमेंट (equity-linked investments) जैसे कि म्यूचुअल फंड्स (mutual funds) या नेशनल पेंशन सिस्टम (NPS) से मिलने वाले लॉन्ग-टर्म ग्रोथ रिटर्न इसमें नहीं मिलते।

अलग-अलग इन्वेस्टमेंट ऑप्शन्स जैसे पब्लिक प्रोविडेंट फंड (PPF), म्यूचुअल फंड्स और अन्य मार्केट-लिंक्ड प्रोडक्ट्स में पैसा लगाने से रिस्क मैनेज होता है और महंगाई को मात देने वाले बेहतर रिटर्न्स मिलने की संभावना बढ़ती है।

बीच में पैसा निकालने की आदत से बचें

रिटायरमेंट के लिए पर्याप्त फंड जमा करने में एक बड़ी रुकावट यह भी है कि लोग करियर के बीच में EPF से पैसा निकाल लेते हैं। घर, बच्चों की पढ़ाई या किसी और ज़रूरत के लिए की गई ये निकासी कंपाउंडिंग (compounding) की ताकत को खत्म कर देती है।

रिटायरमेंट सेविंग्स में सबसे अहम रोल कंपाउंड इंटरेस्ट (compound interest) का होता है, जो सालों-साल जमा होकर बढ़ता है। करियर के दौरान छोटी सी निकासी भी आखिर में मिलने वाली रकम को काफी कम कर सकती है। इसलिए, रिटायरमेंट तक इस पैसे को छूना नहीं चाहिए।

हेल्थकेयर और आकस्मिक खर्चों का भी रखें ध्यान

रिटायरमेंट प्लानिंग में अक्सर रोज़मर्रा के खर्चों पर ज़्यादा ध्यान दिया जाता है, लेकिन रेगुलेटर्स का कहना है कि हेल्थकेयर का खर्च सबसे अप्रत्याशित और अस्थिर होता है। मेडिकल इन्फ्लेशन (medical inflation) अक्सर जनरल इन्फ्लेशन (general inflation) से ज़्यादा होता है।

इसलिए, बढ़ती उम्र के साथ स्वास्थ्य पर होने वाले खर्चों के लिए अलग से प्लानिंग ज़रूरी है। एक कंप्रीहेंसिव रिटायरमेंट स्ट्रैटेजी (comprehensive retirement strategy) में मेडिकल इंश्योरेंस (medical insurance) और एक इमरजेंसी फंड (emergency fund) का प्रावधान भी होना चाहिए, जो रिटायरमेंट कॉर्पस से अलग हो। सबसे ज़रूरी है कि एक ऐसा इन्फ्लेशन-एडजस्टेड पोर्टफोलियो (inflation-adjusted portfolio) बनाया जाए जो आपकी उम्र, इनकम और रिस्क लेने की क्षमता के हिसाब से बदलता रहे, न कि वन-साइज़-फिट्स-ऑल (one-size-fits-all) अप्रोच पर चले।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.