हाल ही में सामने आए **₹40 लाख** के मेडिकल बिल ने रिटायरमेंट फंड की पर्याप्तता पर गंभीर बहस छेड़ दी है। फाइनेंशियल एक्सपर्ट्स का मानना है कि पारंपरिक बचत योजनाएं तेजी से बढ़ती मेडिकल महंगाई के आगे छोटी पड़ रही हैं।
एक सिंगल हार्ट सर्जरी का ₹40 लाख का बिल यह सोचने पर मजबूर करता है कि क्या हमारी रिटायरमेंट प्लानिंग में कोई बड़ी कमी है। आमतौर पर लोग अपने रिटायरमेंट फंड को खाने-पीने और रहने-सहने के खर्चों के हिसाब से प्लान करते हैं, लेकिन मेडिकल इमरजेंसी को नजरअंदाज कर देते हैं। एक छोटी सी हेल्थ क्राइसिस पूरी जिंदगी की कमाई को पानी की तरह बहा सकती है।
मेडिकल इन्फ्लेशन का बड़ा असर
भारत में मेडिकल इन्फ्लेशन आम महंगाई (जो 5% से 6% के आसपास रहती है) की तुलना में कहीं अधिक तेजी से बढ़ रही है। इसका मतलब यह है कि जो सर्जरी आज ₹10 लाख में हो रही है, वह 10 साल बाद काफी महंगी हो सकती है। अब समय आ गया है कि हेल्थ खर्च को फिक्स्ड एक्सपेंस नहीं, बल्कि हाई-रिस्क वेरिएबल खर्च के रूप में देखा जाए।
इंश्योरेंस की कमी
ज्यादातर पुरानी हेल्थ इंश्योरेंस पॉलिसी में कवर लिमिट सिर्फ ₹5 लाख से ₹10 लाख के बीच है, जो आज के महंगे प्राइवेट अस्पतालों में नाकाफी है। एक्सपर्ट्स सलाह दे रहे हैं कि अब कम से कम ₹1 करोड़ तक का कवर जरूरी है। हालांकि, उम्र बढ़ने के साथ प्रीमियम महंगा हो जाता है, इसलिए जल्दी निवेश शुरू करना ही समझदारी है।
हेल्थ के लिए अलग से इमरजेंसी फंड
फाइनेंशियल प्लानर्स का सुझाव है कि अपने पोर्टफोलियो में एक 'लिक्विड ब्रिज' रखें। इसमें कुछ पैसा लिक्विड म्यूचुअल फंड या स्वीप-इन फिक्स्ड डिपॉजिट में रखें, जिसे जरूरत पड़ने पर तुरंत निकाला जा सके। बाजार में गिरावट के वक्त लॉन्ग-टर्म निवेश को बेचना जोखिम भरा हो सकता है। अपनी पॉलिसी की सब-लिमिट्स और को-पेमेंट क्लॉज को आज ही चेक करें ताकि वक्त पर मुसीबत न आए।
