शहरी भारत में 25 साल की उम्र तक एक बच्चे की परवरिश का खर्च अब ₹4 करोड़ तक पहुंच गया है। इसकी मुख्य वजह **10-12%** की सालाना एजुकेशन महंगाई है। ऐसे में इक्विटी SIP और टैक्स-बेनिफिट स्कीम के जरिए सही फाइनेंशियल प्लानिंग करना बेहद जरूरी है।
भारत के शहरी परिवारों के लिए बच्चों की परवरिश और उनकी पढ़ाई का खर्च अब एक बड़ी चुनौती बन गया है। एक बच्चे को 25 साल की उम्र तक बड़ा करने और उसे शिक्षित करने का कुल खर्च अब ₹4 करोड़ तक पहुंच रहा है। यह आंकड़ा न केवल जीवनशैली और स्वास्थ्य संबंधी खर्चों को दर्शाता है, बल्कि इसमें एजुकेशन सेक्टर में आई बेतहाशा महंगाई का भी बड़ा योगदान है।
एजुकेशन महंगाई की मार
भारत में एजुकेशन की लागत इस समय 10% से 12% की दर से बढ़ रही है, जो आम रिटेल महंगाई से काफी ज्यादा है। इसका मतलब यह है कि मिडिल क्लास परिवारों के लिए स्कूल और कॉलेज की फीस हर 6 से 7 साल में दोगुनी हो रही है। यदि अभी से ठोस रणनीति नहीं अपनाई गई, तो बच्चे के 18 से 25 साल के होने पर (हायर एजुकेशन के समय) परिवारों के सामने भारी नकदी संकट (Liquidity Crunch) आ सकता है।
वेल्थ मैनेजमेंट का सही तरीका
केवल बैंक सेविंग्स अकाउंट पर भरोसा करना अब काफी नहीं है। फाइनेंशियल एक्सपर्ट्स का मानना है कि बच्चे के जन्म के साथ ही इन्वेस्टमेंट शुरू करना सबसे अच्छा है। डाइवर्सिफाइड इक्विटी फंड्स में अनुशासन के साथ मंथली निवेश (SIP) करना जरूरी है। यदि आप ₹20,000 से ₹30,000 की मासिक SIP शुरू करते हैं और इसे हर साल 10% बढ़ाते हैं, तो आप लंबे समय में एक बड़ा कॉर्पस तैयार कर सकते हैं।
टैक्स-एफिशिएंट स्कीम्स का सहारा
पोर्टफोलियो में स्थिरता लाने के लिए सरकारी और टैक्स-एफिशिएंट स्कीम जैसे 'सुकन्या समृद्धि योजना' (SSY) और 'पब्लिक प्रोविडेंट फंड' (PPF) को शामिल करना समझदारी है। इसके अलावा, हाल ही में आई 'NPS वात्सल्य' स्कीम भी बच्चों के भविष्य के लिए निवेश का एक बेहतरीन विकल्प है, जो लॉन्ग टर्म में टैक्स लाभ के साथ वेल्थ क्रिएशन में मदद करती है।
रिस्क मैनेजमेंट (Risk Mitigation)
बच्चे के भविष्य की फाइनेंशियल प्लानिंग तब तक अधूरी है, जब तक माता-पिता के लिए सुरक्षा कवच न हो। परिवार के मुख्य कमाने वाले सदस्य को अपनी सालाना आय का 15 से 20 गुना तक का 'टर्म इंश्योरेंस' जरूर लेना चाहिए। साथ ही, एक व्यापक 'हेल्थ इंश्योरेंस' पॉलिसी का होना भी जरूरी है ताकि मेडिकल इमरजेंसी आने पर बच्चे की पढ़ाई के लिए जुटाया गया फंड खर्च न करना पड़े।
