अगर आप 55 साल की उम्र में नौकरी छोड़ने का प्लान बना रहे हैं, तो सावधान हो जाएं। बढ़ती महंगाई और मेडिकल खर्चों को देखते हुए पुराने 20 गुना (20x) का गणित अब पुराना हो चुका है। अब आपको अपने खर्चों का कम से कम 25 से 30 गुना फंड जुटाने की सलाह दी जा रही है।
55 साल की उम्र में रिटायर होना एक आकर्षक लक्ष्य हो सकता है, लेकिन यह आपकी फाइनेंशियल प्लानिंग के गणित को पूरी तरह बदल देता है। 60 साल के सामान्य रिटायरमेंट की तुलना में आप न केवल 5 साल की अपनी कमाई छोड़ रहे हैं, बल्कि अपनी रिटायरमेंट लाइफ को भी 30 साल या उससे ज्यादा के लिए खींच रहे हैं। यह लंबा समय आपके फंड को महंगाई और लिक्विडिटी गैप जैसे बड़े खतरों के सामने खड़ा कर देता है।
महंगाई का गणित और कॉर्पस की जरूरत
ज्यादातर निवेशक 20 गुना (20x) एनुअल खर्चों के पुराने फॉर्मूले पर भरोसा करते हैं, लेकिन अर्ली रिटायरमेंट के लिए यह काफी नहीं है। भारत में महंगाई दर अक्सर 5% से 7% के बीच रहती है। उदाहरण के लिए, आज जो खर्च ₹60,000 प्रति माह है, वह 5 साल बाद ₹80,000 से ऊपर जा सकता है। इसलिए, अपनी पूरी जिंदगी के लिए फंड सुरक्षित रखने हेतु फाइनेंशियल प्लानर्स अब 25x से 30x का टारगेट रखने की सलाह दे रहे हैं।
रिटायरमेंट से पहले का लिक्विडिटी गैप
55 की उम्र में रिटायर होने पर सबसे बड़ी समस्या लिक्विडिटी गैप की होती है। नेशनल पेंशन सिस्टम (NPS) जैसे कई रिटायरमेंट विकल्प 60 साल से पहले निकासी पर सख्त शर्तें लगाते हैं। अक्सर आपको कॉर्पस का एक बड़ा हिस्सा एन्युटी प्लान में डालना पड़ता है, जिससे हाथ में आने वाला पैसा सीमित हो जाता है। ऐसे में आपको एक ऐसी स्ट्रैटेजी बनानी होगी जिसमें लिक्विड एसेट्स हाथ में रहें, ताकि 60 की उम्र तक बिना तनाव के गुजारा हो सके।
हेल्थकेयर का जोखिम
अर्ली रिटायरमेंट के लिए सबसे बड़ा खतरा है 'हेल्थकेयर इन्फ्लेशन', जो आम महंगाई से कहीं ज्यादा है। भारत में मेडिकल खर्च सालाना 12% से 14% की रफ्तार से बढ़ रहे हैं, जिससे इलाज का खर्च हर 5-7 साल में दोगुना हो सकता है। आमतौर पर हेल्थ इंश्योरेंस में भी आउट-ऑफ-पॉकेट खर्च कवर नहीं होते। इसलिए, अपने मेडिकल खर्चों के लिए एक अलग 'कंटिजेंसी फंड' बनाना बहुत जरूरी है, ताकि किसी मेडिकल इमरजेंसी के वक्त आपकी मुख्य बचत पर आंच न आए।
