रिटायरमेंट की प्लानिंग करते समय ज्यादातर लोग 80 साल की उम्र को आधार मानते हैं, जो कि जोखिम भरा हो सकता है। बढ़ती उम्र और महंगाई को देखते हुए, एक्सपर्ट्स अब 95 साल तक की आर्थिक सुरक्षा का लक्ष्य रखने की सलाह दे रहे हैं ताकि आप 'मिड-रिटायरमेंट क्राइसिस' से बच सकें।
रिटायरमेंट प्लानिंग में अक्सर 80 साल को एक बेंचमार्क माना जाता है। लेकिन बेहतर लाइफस्टाइल और मेडिकल सुविधाओं के कारण लोग अब 90 साल से ज्यादा जीने लगे हैं। यह एक 'लॉन्गेविटी ट्रैप' (Longevity Trap) पैदा करता है, जहाँ 15-20 साल के लिए बनाया गया कॉर्पस (Corpus) 30 साल की लंबी अवधि में कम पड़ जाता है। इस एक दशक के अंतर को नजरअंदाज करना भारी पड़ सकता है।
महंगाई की मार (Impact of Inflation)
महंगाई आपके रिटायरमेंट फंड को धीरे-धीरे खत्म कर देती है। अगर आप 6% की वार्षिक महंगाई दर को भी देखें, तो 30 साल की अवधि में रोजमर्रा के खर्च जैसे भोजन और बिल 3 गुना से ज्यादा बढ़ सकते हैं। इसलिए अपने प्लान में महंगाई के असर को पहले से जोड़कर चलना बहुत जरूरी है।
हेल्थकेयर का बढ़ता खर्च
रिटायरमेंट प्लानिंग में अक्सर मेडिकल खर्चों को कम करके आंका जाता है। उम्र बढ़ने के साथ न केवल इंश्योरेंस प्रीमियम, बल्कि बिना कवर वाले इलाज और रेगुलर चेक-अप का खर्च भी बढ़ता है। एक अलग मेडिकल इमरजेंसी बफर (Medical Emergency Buffer) रखना इसलिए जरूरी है, ताकि सेहत बिगड़ने पर आपको अपनी लॉन्ग-टर्म सेविंग्स न तोड़नी पड़ें।
मार्केट उतार-चढ़ाव से सुरक्षा
रिटायरमेंट के शुरुआती सालों में अगर बाजार में गिरावट आती है, तो उसे 'सीक्वेंस ऑफ रिटर्न्स रिस्क' कहते हैं। इससे बचने के लिए अपने पोर्टफोलियो को अलग-अलग हिस्सों या 'बकेट्स' (Buckets) में बांटें। उदाहरण के लिए, 2 से 3 साल का खर्चा लिक्विड फंड्स या सुरक्षित विकल्पों में रखें, ताकि बाजार गिरने पर भी आपको अपनी ग्रोथ वाली एसेट्स घाटे में न बेचनी पड़ें।
पैसिव इनकम पर जोर
सारा पैसा लंपसम कॉर्पस पर निर्भर रहने के बजाय पेंशन, एन्युइटी (Annuity) या रेंटल इनकम जैसे पैसिव इनकम के रास्ते तलाशें। इससे आपकी पूंजी पर दबाव कम होगा और निवेश लंबे समय तक मार्केट में बना रह सकेगा। आज की सही प्लानिंग ही कल आपको 95 साल की उम्र तक आर्थिक आजादी दिलाएगी।
