रिटायरमेंट प्लानिंग अक्सर तब फेल हो जाती है जब निवेशक केवल एक बड़े कॉर्पस (Corpus) के पीछे भागते हैं। भारतीय निवेशकों के लिए बेहतर यही है कि वे ऐसे इनकम सोर्स तैयार करें जो महंगाई को मात दे सकें, जैसे डिविडेंड और रेंटल इनकम।
ज्यादातर लोग रिटायरमेंट के नाम पर 5 या 10 करोड़ का एक बड़ा और काल्पनिक लक्ष्य तय कर लेते हैं, जो आगे चलकर तनाव का कारण बनता है। असल में, रिटायरमेंट का असली मकसद एक तय जीवनशैली को बरकरार रखना है। इसलिए, 'कितना पैसा चाहिए' के बजाय यह कैलकुलेट करना ज्यादा जरूरी है कि रिटायरमेंट के बाद आपकी मंथली जरूरतें क्या होंगी और उन्हें महंगाई के हिसाब से कैसे मैनेज किया जाएगा।
कैश फ्लो पर शिफ्टिंग
एक मोटा पैसा यानी लंप-सम (Lump sum) रकम धोखा दे सकती है। अगर मार्केट में गिरावट आई या बाजार की स्थिति बिगड़ी, तो आपकी जमा पूंजी तेजी से खत्म हो सकती है। इसके बजाय, ऐसे एसेट क्लास पर ध्यान दें जो कैश फ्लो जनरेट करते हों। इसमें डिविडेंड देने वाले शेयर, रेंटल इनकम, एन्युटी प्लान और सरकारी स्कीम जैसे PPF और SCSS शामिल हैं। इससे आपको अपनी मूल पूंजी को बार-बार बेचने की जरूरत नहीं पड़ेगी।
कंपाउंडिंग और कर्ज का गणित
फाइनेंशियल प्लानिंग में समय ही सबसे बड़ा एसेट है। SIP के जरिए छोटी शुरुआत करना आपको मार्केट के उतार-चढ़ाव से बचाता है। साथ ही, रिटायरमेंट से पहले अपने सभी बड़े कर्ज, खासकर होम लोन को खत्म करना जरूरी है। आपका रिटायरमेंट प्लान उतना ही मजबूत होता है जितना कि आपका बैलेंस शीट।
महंगाई और हेल्थकेयर के खतरे
रिटायरमेंट फंड के लिए महंगाई और मेडिकल खर्च सबसे बड़ा खतरा हैं। भारत में हेल्थकेयर इंफ्लेशन आम महंगाई दर से काफी तेज है। बिना अच्छी मेडिकल इंश्योरेंस और इमरजेंसी फंड के, एक बड़ी बीमारी आपकी सालों की बचत को कुछ ही समय में खत्म कर सकती है।
सही एसेट एलोकेशन
करियर की शुरुआत में इक्विटी में निवेश करें ताकि लंबी अवधि में महंगाई को मात मिल सके, लेकिन रिटायरमेंट के करीब आते-आते रणनीति को 'कैपिटल प्रोटेक्शन' की ओर ले जाना चाहिए। रिटायरमेंट एक बार की प्रक्रिया नहीं, बल्कि निरंतर चलने वाला सफर है। हर साल अपने पोर्टफोलियो और जीवनशैली की जरूरतों को रिव्यु करते रहें ताकि आपका पैसा आपके लिए लगातार काम करता रहे।
