रिटायरमेंट के बाद हर महीने होने वाले खर्चों को पूरा करने के लिए केवल एक स्कीम पर निर्भर रहना जोखिम भरा हो सकता है। सीनियर सिटीजन सेविंग्स स्कीम (SCSS), पोस्ट ऑफिस मंथली इनकम स्कीम (MIS) और बैंक FDs का सही कॉम्बिनेशन न केवल आपकी मंथली लिक्विडिटी को मैनेज करेगा, बल्कि सुरक्षा और टैक्स प्लानिंग में भी मदद करेगा।
नौकरी के बाद रेगुलर सैलरी का दौर खत्म हो जाता है, इसलिए निवेश का नजरिया ग्रोथ से हटकर 'स्टेडी कैश फ्लो' की तरफ शिफ्ट होना जरूरी है। सबसे बड़ी गलती किसी एक ही इंस्ट्रूमेंट पर पूरा भरोसा करना है, जिससे लिक्विडिटी की दिक्कत हो सकती है।
सीनियर सिटीजन सेविंग्स स्कीम (SCSS)
यह स्कीम इस रणनीति का मुख्य आधार है। फाइनेंशियल ईयर 2026-27 की दूसरी तिमाही के लिए इस पर 8.2% सालाना ब्याज मिल रहा है। इसमें प्रति व्यक्ति अधिकतम ₹30 लाख तक निवेश किया जा सकता है। इसका टेन्योर 5 साल का है, जिसे 3 साल के लिए बढ़ाया जा सकता है। हालांकि, इसमें ब्याज का भुगतान तिमाही (Quarterly) आधार पर होता है, जो हर महीने खर्च चलाने वालों के लिए थोड़ा मुश्किल हो सकता है।
पोस्ट ऑफिस मंथली इनकम स्कीम (MIS)
SCSS की तिमाही पेमेंट की समस्या को दूर करने के लिए MIS एक बेहतरीन विकल्प है। इसमें ब्याज दर आमतौर पर 7.4% के आसपास रहती है, लेकिन इसका सबसे बड़ा फायदा यह है कि ब्याज का पैसा हर महीने खाते में क्रेडिट होता है। यह घर के खर्चों को निपटाने में काफी मददगार साबित होता है।
बैंक FDs और लिक्विडिटी का तालमेल
बैंक FDs निवेश में लचीलापन जोड़ती हैं। आप 'FD लैडरिंग' का उपयोग कर अलग-अलग समय पर मेच्योर होने वाली FD बना सकते हैं, जो इमरजेंसी के समय सुरक्षा कवच की तरह काम करती है। निवेश करते समय DICGC के नियमों को याद रखें, जो प्रति बैंक ₹5 लाख (मूलधन + ब्याज) तक की सुरक्षा देता है। इसलिए बड़े कॉर्पस को एक ही बैंक में रखने के बजाय अलग-अलग बैंकों में बांटना समझदारी है।
टैक्स और इन्फ्लेशन का ध्यान रखें
याद रखें कि SCSS, MIS और बैंक FDs से मिलने वाला ब्याज आपके टैक्स स्लैब के अनुसार पूरी तरह टैक्सेबल होता है। इसका मतलब है कि टैक्स कटने के बाद आपके हाथ में आने वाला 'नेट रिटर्न' काफी कम हो सकता है। साथ ही, महंगाई को मात देने के लिए यह जरूरी है कि आप केवल फिक्स्ड इनकम के भरोसे न रहें और पोर्टफोलियो का संतुलन बनाए रखें ताकि आपकी भविष्य की जरूरतें पूरी होती रहें।
