रिटायरमेंट के लिए लोकप्रिय '4% विड्रॉल रूल' अमेरिकी बाजार के डेटा पर आधारित है, जो भारत में बढ़ती महंगाई और हेल्थकेयर खर्चों के सामने कम पड़ सकता है। निवेशकों को बाजार की अस्थिरता से बचने के लिए 'बकेट स्ट्रेटजी' जैसे लचीले तरीकों की जरूरत है।
4% नियम का सच
रिटायरमेंट प्लानिंग में 4% का नियम एक लोकप्रिय बेंचमार्क है, जिसके तहत आप अपने पोर्टफोलियो का 4% हर साल निकाल सकते हैं। लेकिन यह नियम अमेरिकी बाजार के लिए बना था। भारत की आर्थिक परिस्थितियों में इसे आंख मूंदकर फॉलो करना खतरनाक हो सकता है और आपके पास 25-30 साल के रिटायरमेंट के अंत तक पैसा खत्म होने का बड़ा रिस्क हो सकता है।
महंगाई का दोहरा मार
भारत में सामान्य महंगाई दर 6% से 7% के बीच रहती है, लेकिन मेडिकल महंगाई 10% से 14% तक पहुंच जाती है। यदि आपका पोर्टफोलियो सिर्फ 5-6% रिटर्न दे रहा है, तो बढ़ती महंगाई आपकी क्रय शक्ति (Purchasing Power) को हर साल कम कर देगी।
रिस्क और समाधान
रिटायरमेंट की शुरुआत में ही बाजार में गिरावट आना 'सीक्वेंस ऑफ रिटर्न्स रिस्क' पैदा करता है। इससे बचने के लिए फाइनेंशियल प्लानर्स 'बकेट स्ट्रेटजी' की सलाह देते हैं।
बकेट स्ट्रेटजी: इसमें आप 2-3 साल के खर्च के लिए पैसा लिक्विड फंड या बैंक डिपॉजिट (लो-रिस्क एसेट) में रखते हैं। बाजार गिरने पर आप इसी 'कैश बकेट' से खर्च चलाते हैं, ताकि आपको अपने लॉन्ग-टर्म इक्विटी इन्वेस्टमेंट को नुकसान में न बेचना पड़े।
गार्डरेल अप्रोच: इसमें बाजार खराब रहने पर आप अपना खर्च थोड़ा कम करते हैं और अच्छे बाजार में इसे बढ़ाते हैं। सफल रिटायरमेंट के लिए एक फिक्स्ड नंबर पर निर्भर रहने के बजाय बाजार की स्थितियों और अपने हेल्थ खर्चों के हिसाब से पोर्टफोलियो को हर साल रिव्यू करना बेहद जरूरी है।
