रिटेलर्स 'No-Cost' EMI को बिना ब्याज के ऑफर करते हैं, लेकिन इसमें प्रोसेसिंग फीस, नकद छूट का नुकसान और GST जैसे कई छुपे हुए खर्च होते हैं। यह स्कीम **20%** से ज्यादा महंगी हो सकती है।
त्योहारी सीजन हो या आम दिन, रिटेलर्स बड़े सामानों को बेचने के लिए 'No-Cost' EMI का जाल बिछाते हैं। देखने में ये स्कीम ब्याज-मुक्त लगती है, लेकिन हकीकत में यह मार्केटिंग का एक पैंतरा है।
'No-Cost' का गणित और छुपे हुए खर्च
इस स्कीम में रिटेलर आपसे एमआरपी (MRP) वसूलता है, जबकि नकद भुगतान करने वाले ग्राहक को 5% से 10% तक का डिस्काउंट आसानी से मिल जाता है। EMI चुनने पर आप उसी डिस्काउंट को 'ब्याज' के रूप में चुका रहे होते हैं। इसके अलावा:
- प्रोसेसिंग फीस: बैंक या लेंडर लोन अमाउंट का 1% से 3% तक चार्ज करते हैं।
- GST का मार: EMI के ब्याज घटक पर 18% GST लगता है।
- वास्तविक लागत: इन सभी खर्चों को जोड़ने पर प्रभावी ब्याज दर 20% से ऊपर निकल जाती है, जो कि पूरी तरह से 'फ्री' होने का दावा गलत साबित करती है।
डेट ट्रैप (Debt Trap) का खतरा
इंस्टॉलमेंट के जरिए बड़ी खरीदारी आसान लगती है, जिसे 'इंस्टॉलमेंट स्टैकिंग' कहते हैं। धीरे-धीरे छोटी-छोटी EMI का बोझ आपकी डिस्पोजेबल इनकम को खत्म कर देता है।
सबसे बड़ा जोखिम यह है कि यदि आप एक भी EMI चूकते हैं, तो भारी पेनल्टी के साथ आपका क्रेडिट स्कोर भी गिर जाता है। 2026 के मध्य से क्रेडिट ब्यूरो की रिपोर्टिंग इतनी सख्त हो गई है कि साप्ताहिक अपडेट्स के कारण एक छोटी सी चूक भविष्य में आपके लिए होम लोन या एजुकेशन लोन लेना मुश्किल बना सकती है।
समझदारी कैसे बरतें?
अगली बार कोई सामान खरीदने से पहले, 'No-Cost' EMI वाली कीमत की तुलना नकद डिस्काउंट वाली कीमत से जरूर करें। यदि नकद भुगतान पर डिस्काउंट मिल रहा है, तो समझ लीजिए कि वह EMI 'फ्री' नहीं है। हमेशा कुल खर्च की गणना करें, ताकि आप कर्ज के जाल में फंसने से बच सकें।
