बहुत से निवेशक पैसिव इनकम के लिए दूसरा घर खरीदते हैं, लेकिन छिपे हुए खर्चे इस इन्वेस्टमेंट को घाटे का सौदा बना देते हैं। ग्रॉस यील्ड देखकर खुश होने से पहले यह समझना जरूरी है कि मेंटेनेंस, EMI और टैक्स का बोझ आपकी कमाई को खत्म कर सकता है।
भारतीय निवेशकों के लिए दूसरा घर खरीदना हमेशा से पैसिव इनकम का सबसे पसंदीदा जरिया रहा है। लोग अक्सर एक अपार्टमेंट खरीदते हैं और सोचते हैं कि किराए से EMI की किस्तें निकल जाएंगी। लेकिन, हकीकत ब्रोशर पर दिखने वाले सपनों से काफी अलग है। कई मामलों में, रेंटल प्रॉपर्टी एक 'नेगेटिव-कैरी' एसेट साबित होती है, यानी इसे बनाए रखने का खर्च इससे होने वाली कमाई से ज्यादा होता है।
ग्रॉस रेंटल यील्ड का जाल
निवेशक अक्सर केवल ग्रॉस रेंटल यील्ड को देखते हैं। अगर ₹1 करोड़ की प्रॉपर्टी पर ₹40,000 महीना किराया मिल रहा है, तो ग्रॉस यील्ड 4.8% के आसपास दिखती है। लेकिन यह आंकड़ा मेंटेनेंस चार्ज, प्रॉपर्टी टैक्स, इंश्योरेंस और ब्रोकर कमीशन को नजरअंदाज कर देता है। जब ये खर्चे निकलते हैं, तो नेट रेंटल यील्ड कई बड़े शहरों में 2% या उससे भी कम रह जाती है, जो कि सरकारी बॉन्ड्स या फिक्स्ड डिपॉजिट से भी कम है।
कर्ज और EMI का असर
अगर प्रॉपर्टी लोन पर ली गई है, तो दबाव और बढ़ जाता है। उदाहरण के लिए, ₹1 करोड़ की प्रॉपर्टी के लिए ₹75 लाख का लोन लेते हैं, तो 8.5% की ब्याज दर पर सालाना EMI करीब ₹7.8 लाख होगी, जबकि रेंटल इनकम सिर्फ ₹4.8 लाख। इसका मतलब है कि आपको हर साल ₹3 लाख का अपनी जेब से भुगतान करना होगा। अगर आपके पास अतिरिक्त सरप्लस इनकम नहीं है, तो यह प्रॉपर्टी एक फाइनेंशियल बोझ बन जाती है।
टैक्स और लिक्विडिटी का जोखिम
टैक्स के नियम भी अब जटिल हो गए हैं। नए टैक्स रिजीम में हाउस प्रॉपर्टी के नुकसान को दूसरी इनकम के साथ सेट-ऑफ करना पहले से कठिन है। साथ ही, रियल एस्टेट एक 'इलिक्विड' एसेट है। स्टैंप ड्यूटी, रजिस्ट्रेशन और इंटीरियर पर लगा पैसा फंस जाता है। म्यूचुअल फंड या REIT की तरह आप जरूरत पड़ने पर इसका एक छोटा हिस्सा नहीं बेच सकते। यदि किराया EMI और मेंटेनेंस का खर्च कवर नहीं कर पा रहा है, तो ऐसी प्रॉपर्टी को केवल कैपिटल एप्रिसिएशन (प्रॉपर्टी की कीमत बढ़ने) की उम्मीद पर ही देखना चाहिए, न कि तुरंत कैश फ्लो के स्रोत के रूप में।
