बाजार में उतार-चढ़ाव और सेक्टर्स का बंटवारा
बाजार की अस्थिरता (Volatility) आज कल आम है, लेकिन इसका असर हर सेक्टर पर एक जैसा नहीं दिख रहा। 3P Investment Managers के Prashant Jain का कहना है कि भारत की अर्थव्यवस्था पहले के मुकाबले अब तेल के झटकों से कम प्रभावित होती है, इसलिए भू-राजनीतिक घटनाएं (Geopolitical Events) ज्यादा देर तक असर नहीं डालेंगी। ऐसे में निवेशकों को जनरल ट्रेंड्स से हटकर, खास सेक्टर और कंपनी के मौके और जोखिमों पर ध्यान देना चाहिए। उन्होंने स्मॉल और मिड-कैप (SMID) शेयरों की धीमी पड़ती रफ्तार पर भी जोर दिया, जिसे वे असल प्रॉफिट ग्रोथ की बजाय अटकलों (Speculation) से प्रेरित बता रहे हैं।
सेक्टर परफॉर्मेंस और वैल्यूएशन्स
फिलहाल Nifty 50 का P/E रेश्यो लगभग 20.85 है, जो बड़ी कंपनियों के लिए ज्यादातर उचित वैल्यूएशन (Valuation) बताता है। लेकिन इस आम तस्वीर के पीछे अलग-अलग सेक्टर्स में बड़ा अंतर है। उदाहरण के लिए, टेक्नोलॉजी (IT) सेक्टर ने हाल ही में 2020 के बाद का सबसे खराब हफ्ता देखा। ऑटो सेक्टर (Nifty Auto PE ~30.33) को ग्लोबल इकोनॉमी में बदलाव और बढ़ते खर्चों से चुनौती मिल रही है। वहीं, 14.79 के P/E वाले बैंकिंग सेक्टर को ऊंची यील्ड (Yield) और वर्किंग कैपिटल (Working Capital) की बढ़ती मांग से फायदा मिलने की उम्मीद है, जिसे Prashant Jain भी मानते हैं और वे फाइनेंशियल सेक्टर को तरजीह दे रहे हैं। फार्मा और एफएमसीजी (FMCG) जैसे सेक्टर्स पर सीधा असर कम रहने का अनुमान है। रियल एस्टेट सेक्टर का भविष्य मिला-जुला है, मध्यम आय वाले घरों में स्थिरता दिख रही है, लेकिन लग्जरी सेगमेंट में लागत बढ़ने और अफोर्डेबिलिटी (Affordability) की दिक्कत के कारण ग्रोथ धीमी है।
SMID शेयर्स: मोमेंटम या फंडामेंटल्स?
Prashant Jain इस बात पर जोर देते हैं कि स्मॉल और मिड-कैप (SMID) शेयरों का हालिया मजबूत प्रदर्शन फंडामेंटल्स (Fundamentals) के बजाय मोमेंटम (Momentum) से प्रेरित था, और इसलिए यह टिकाऊ नहीं है। Nifty Midcap 100 का P/E करीब 36.5 और Nifty Smallcap 250 का P/E लगभग 29.67 है। Jain का कहना है कि लार्ज-कैप (Large-cap) शेयरों में पहले ही 10-15% की गिरावट आ चुकी है, और SMID शेयरों में इससे भी ज्यादा, जो लंबी अवधि के निवेशकों के लिए वैल्यू (Value) पैदा कर सकता है। BlackRock के CEO Larry Fink ने चेतावनी दी है कि मध्य पूर्व के तनाव के कारण तेल की कीमतें $150 प्रति बैरल तक जा सकती हैं, जिससे ग्लोबल मंदी (Recession) आ सकती है। हालांकि, 3-5% की मामूली महंगाई भारतीय बाजारों के लिए अच्छी रही है, लेकिन बहुत ज्यादा महंगाई कंपनियों के मार्जिन पर दबाव डालती है, खासकर उन पर जिनकी प्राइसिंग पावर (Pricing Power) सीमित है।
भारत की आर्थिक मजबूती और जोखिम
भारत की बदलती आर्थिक संरचना, जहां जीडीपी (GDP) के मुकाबले तेल आयात का हिस्सा पहले के मुकाबले कम है, ऊंची कच्चे तेल की कीमतों के खिलाफ मजबूती देती है। फिर भी, ऑयल मार्केटिंग कंपनीज़ (OMCs), एयरलाइंस और सीमेंट जैसे सेक्टर सीधे तौर पर बढ़ती ऊर्जा लागत और सप्लाई की दिक्कतों से जुड़े हुए हैं। डोमेस्टिक इंस्टीट्यूशनल इन्वेस्टमेंट (Domestic Institutional Investment) का सपोर्ट बना हुआ है, जो विदेशी निवेशकों के आउटफ्लो (Outflow) को कुछ हद तक कम कर रहा है। बाजार की गिरावट को झेलने की क्षमता, जो लार्ज-कैप के लिए 20% और SMID के लिए इससे भी ज्यादा हो सकती है, बताती है कि वैल्यूएशन रीसेट (Valuation Reset) हो रहा है, जो अनुशासित निवेशकों के लिए मौके बना सकता है।
लंबी अवधि का पॉजिटिव नज़रिया
आगे चलकर, Prashant Jain को उम्मीद है कि मौजूदा बाजार चुनौतियों के बावजूद, अगले तीन सालों में भारतीय इक्विटी (Equity) से सालाना करीब 15% का रिटर्न मिलेगा। यह उम्मीद अगले तीन सालों में सालाना 12% की अनुमानित अर्निंग ग्रोथ (Earnings Growth) और वैल्यूएशन में संभावित बढ़ोतरी पर आधारित है, खासकर SMID शेयरों में आई गिरावट से वैल्यू बनने की उम्मीद है। उनका मानना है कि लार्ज-कैप शेयरों के लिए डाउनसाइड रिस्क (Downside Risk) सीमित है, जिससे मौजूदा वैल्यूएशन लंबी अवधि के निवेशकों के लिए अच्छा रिस्क-रिवॉर्ड बैलेंस (Risk-Reward Balance) पेश करते हैं। यह अनुमान बताता है कि यह ऐसा बाजार होगा जहां अटकलों से प्रेरित ब्रॉड रैली के बजाय, ध्यान से शेयर चुनना और फंडामेंटल वैल्यू पर फोकस करना ही अहम होगा।
