कई निवेशक सिर्फ ढेर सारे शेयर्स या फंड्स को होल्ड करने को ही डाइवर्सिफिकेशन समझ लेते हैं। पोर्टफोलियो का सही ऑडिट आपको जोखिमों से बचाता है और यह सुनिश्चित करता है कि आपकी निवेश रणनीति आपके भविष्य के लक्ष्यों के साथ मेल खा रही है या नहीं।
बहुत से भारतीय निवेशक अपनी पोर्टफोलियो में लगातार नए म्यूचुअल फंड्स या स्टॉक्स जोड़ते रहते हैं, यह सोचकर कि जितने ज्यादा निवेश होंगे, सुरक्षा उतनी ही ज्यादा होगी। हालांकि, यह अक्सर डाइवर्सिफिकेशन का एक भ्रम मात्र होता है। एक पोर्टफोलियो रिव्यू यह जांचने के लिए बेहद जरूरी है कि क्या आपके निवेश एक-दूसरे के पूरक (complement) हैं, या फिर वे आपस में ओवरलैप कर रहे हैं। ओवरलैपिंग के कारण आप मार्केट की उतार-चढ़ाव (volatility) के प्रति उम्मीद से कहीं ज्यादा एक्सपोज्ड हो जाते हैं।
ओवरलैपिंग का खतरा
अक्सर समस्या एसेट डिस्ट्रीब्यूशन में होती है। मान लीजिए आपने कई अलग-अलग लार्ज-कैप फंड्स ले रखे हैं, लेकिन अगर वे सभी उन्हीं 15-20 चुनिंदा ब्लू-चिप कंपनियों में पैसा लगा रहे हैं, तो आपके पोर्टफोलियो में विविधता नहीं है। जब बाजार गिरता है, तो ऐसे में सब कुछ एक साथ नीचे आता है। ऑडिट आपको इन कमियों को पहचानने और उन एसेट्स में पैसा शिफ्ट करने का मौका देता है जो मार्केट के अलग-अलग बदलावों पर अलग तरह से रिएक्ट करते हैं।
रिटर्न्स के पीछे भागने की गलती
एक और बड़ी गलती 'परफॉर्मेंस चेजिंग' है। जो स्टॉक या फंड पिछले 1 साल में शानदार रिटर्न दे चुका है, उसमें निवेश करना लुभावना लगता है। लेकिन अक्सर हाई रिटर्न का मतलब होता है कि वह एसेट पहले से महंगा हो चुका है। जब तक आप ट्रेंड को फॉलो करते हैं, तब तक मार्केट की स्थिति बदल चुकी होती है और आप अक्सर ऊपरी स्तरों पर खरीदारी कर बैठते हैं। एक अनुशासित निवेशक अपनी मेहनत की कमाई को प्राइस हिस्ट्री के बजाय सही वैल्युएशन पर लगाता है।
जोखिम और उम्र का तालमेल
रिस्क टॉलरेंस (Risk Tolerance) समय के साथ बदलता है। SEBI भी 'रिस्क-ओ-मीटर' (Riskometer) के जरिए निवेशकों को उनकी क्षमता का आकलन करने के लिए प्रोत्साहित करता है। जैसे-जैसे आपकी उम्र बढ़ती है या आप अपने वित्तीय लक्ष्यों (जैसे बच्चों की पढ़ाई या रिटायरमेंट) के करीब पहुंचते हैं, आपको रिस्की एसेट्स में अपना एक्सपोजर कम करना चाहिए।
रीबैलेंसिंग का महत्व
समय के साथ, जो निवेश अच्छा परफॉर्म करते हैं, वे आपके पोर्टफोलियो का बड़ा हिस्सा बन जाते हैं, जिससे रिस्क का बैलेंस बिगड़ जाता है। रीबैलेंसिंग का मतलब है कि अच्छी परफॉर्म करने वाली संपत्तियों को बेचकर उस हिस्से को अंडर-परफॉर्मिंग एसेट्स में निवेश करना, ताकि पोर्टफोलियो वापस आपके टारगेट के अनुसार आ जाए।
इसके लिए आपको रोजाना मॉनिटरिंग की जरूरत नहीं है। साल में 1 से 2 बार किया गया एक व्यवस्थित ऑडिट काफी है, ताकि यह स्पष्ट रहे कि आपका निवेश अभी भी आपके लक्ष्यों के साथ कदम मिलाकर चल रहा है या नहीं।
