पर्सनल फाइनेंस: क्यों दो इमरजेंसी फंड्स हैं बेहतर?

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AuthorKaran Malhotra|Published at:
पर्सनल फाइनेंस: क्यों दो इमरजेंसी फंड्स हैं बेहतर?

फाइनेंशियल प्लानर्स अब लोगों को अपनी इमरजेंसी सेविंग्स को दो अलग-अलग हिस्सों में बांटने की सलाह दे रहे हैं। यह तरीका आय से जुड़ी दिक्कतों और अचानक होने वाले खर्चों के लिए अलग-अलग सुरक्षा कवच देता है, जिससे लोग अपनी लंबी अवधि की इनवेस्टमेंट्स को तोड़ने से बच पाते हैं।

आय की सुरक्षा और अचानक खर्चों के लिए अलग-अलग फंड

पर्सनल फाइनेंस को मैनेज करते वक्त अप्रत्याशित (unexpected) स्थितियों के लिए तैयार रहना बहुत ज़रूरी है। जहां पहले सिर्फ एक इमरजेंसी फंड बनाने की सलाह दी जाती थी, वहीं अब कई फाइनेंशियल प्लानर्स दो फंड बनाने का सुझाव दे रहे हैं। इसका मकसद घर के कैश फ्लो और लंबी अवधि के इन्वेस्टमेंट पोर्टफोलियो, दोनों को बेहतर सुरक्षा देना है।

पहला इमरजेंसी फंड: यह फंड नौकरी जाने या मेडिकल लीव जैसी आय में रुकावट के समय सुरक्षा कवच का काम करता है। इस फंड में आपकी ज़रूरी मासिक ज़रूरतों, जैसे किराया, ईएमआई, बिजली-पानी का बिल, किराना और इंश्योरेंस प्रीमियम को कवर करने के लिए 3 से 6 महीने का पैसा होना चाहिए। क्योंकि यह पैसा तुरंत इस्तेमाल के लिए चाहिए होता है, इसलिए इसे सेविंग्स अकाउंट या लिक्विड म्यूचुअल फंड जैसी आसानी से कैश होने वाली जगहों पर रखा जाता है।

दूसरा इमरजेंसी फंड: यह फंड खास तौर पर आय से जुड़े नहीं, बल्कि अचानक आने वाले खर्चों के लिए होता है। जैसे घर की अचानक मरम्मत, गाड़ी का मेंटेनेंस या मेडिकल इमरजेंसी जो इंश्योरेंस के दायरे में न आए। इन खर्चों के लिए अलग फंड होने से आप बिना अपने मंथली बजट को बिगाड़े इन ज़रूरतों को पूरा कर सकते हैं।

वेल्थ बनाने के लक्ष्यों की सुरक्षा

इन्वेस्टर्स के लिए सबसे बड़ा खतरा होता है कि उन्हें अपने वेल्थ-बिल्डिंग एसेट्स को समय से पहले बेचना पड़े। जब किसी परिवार के पास छोटे-मोटे, आय से इतर खर्चों के लिए अलग बफर (buffer) नहीं होता, तो उन्हें मजबूरी में इक्विटी म्यूचुअल फंड्स बेचने पड़ सकते हैं या फिक्स्ड डिपॉजिट तुड़वाने पड़ सकते हैं। ऐसा अक्सर गलत समय पर होता है, जिससे नुकसान हो सकता है या कंपाउंडिंग की ताकत से हाथ धोना पड़ सकता है। इन ज़रूरतों के लिए एक अलग, आसानी से एक्सेस होने वाला अकाउंट रखने से यह सुनिश्चित होता है कि आपके ज़रूरी इन्वेस्टमेंट, जैसे रिटायरमेंट या बच्चों की पढ़ाई के लिए रखे गए फंड, सुरक्षित रहें।

अपने दो-फंड स्ट्रेटेजी को कैसे मैनेज करें

दो फंड बनाने का मतलब यह नहीं है कि आपको एक रात में अपनी कुल सेविंग्स को दोगुना करना होगा। ज़्यादातर परिवार पहले अपना प्राइमरी इनकम-प्रोटेक्शन फंड बनाने को प्राथमिकता देते हैं। एक बार यह बेस तैयार हो जाए, तो वे धीरे-धीरे दूसरा फंड बनाना शुरू कर सकते हैं। कई लोग टैक्स रिफंड, एनुअल बोनस या इंटरेस्ट से मिली अचानक आय का इस्तेमाल दूसरे फंड को भरने के लिए करते हैं। चूँकि दूसरे फंड का इस्तेमाल प्राइमरी फंड के मुकाबले कम होता है, इसलिए इसे थोड़ी अलग इंस्ट्रूमेंट्स में रखा जा सकता है, जो लिक्विडिटी और मामूली रिटर्न के बीच संतुलन बनाए रखें।

अगला कदम यह है कि आप अपनी मौजूदा सेविंग्स का ऑडिट करें और अपनी मासिक ज़रूरी खर्चों की असल लागत का पता लगाएं। इसके बाद, आप यह आंकलन कर सकते हैं कि फिलहाल अनिश्चित खर्चों और लॉन्ग-टर्म लक्ष्यों के लिए कितनी नकदी रखी गई है, और आने वाले महीनों में इन अलग-अलग फंड्स को बनाने के लिए अपनी मंथली सेविंग्स में एडजस्टमेंट कर सकते हैं।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.