अगर आपका पब्लिक प्रोविडेंट फंड (PPF) खाता मैच्योर हो गया है, तो 15 साल पूरे होने के एक साल के भीतर फॉर्म H भरना ज़रूरी है। ऐसा न करने पर नए डिपॉजिट रेगुलर नहीं माने जाएंगे और आपको सेक्शन 80C के तहत टैक्स छूट और ब्याज का फायदा नहीं मिलेगा।
पब्लिक प्रोविडेंट फंड (PPF) भारत में कई निवेशकों के लिए रिटायरमेंट प्लानिंग का एक अहम हिस्सा है। इसकी टैक्स-फ्री ब्याज दर और सरकारी गारंटी के कारण यह काफी भरोसेमंद माना जाता है। चूंकि यह एक लॉन्ग-टर्म प्रोडक्ट है, इसलिए कई खाताधारक इसे एक पैसिव इन्वेस्टमेंट के तौर पर देखते हैं, जिसमें ज़्यादा ध्यान देने की ज़रूरत नहीं होती।
हालांकि, 15 साल की मैच्योरिटी पर एक ऐसी बड़ी चूक हो सकती है, जो अगर नज़रअंदाज़ कर दी जाए तो आपके निवेश के फायदों को खत्म कर सकती है।
15 साल बाद क्या होता है?
15 फाइनेंशियल ईयर पूरे होने पर PPF खाता मैच्योर हो जाता है। इस समय निवेशकों के पास कुछ विकल्प होते हैं: वे या तो खाता बंद करके पूरा पैसा निकाल सकते हैं, या खाता बढ़ाने का विकल्प चुन सकते हैं।
लेकिन, अगर आप PPF में आगे भी निवेश जारी रखना चाहते हैं, तो सिर्फ पैसे जमा करते रहना काफी नहीं है। निवेशकों को मैच्योरिटी की तारीख के एक साल के भीतर अपने बैंक या पोस्ट ऑफिस में फॉर्म H जमा करना अनिवार्य है।
फॉर्म H न भरने का क्या है नुकसान?
अगर कोई निवेशक फॉर्म H जमा किए बिना ही पैसे जमा करता रहता है, तो बैंक या पोस्ट ऑफिस उस पैसे को स्वीकार तो कर सकते हैं, लेकिन इन डिपॉजिट्स को 'इरेगुलर' (अनियमित) माना जाता है। इस छोटी सी चूक का बड़ा खामियाजा भुगतना पड़ सकता है।
- इंटरेस्ट का नुकसान: इरेगुलर डिपॉजिट्स पर PPF की स्टैंडर्ड ब्याज दर नहीं मिलती है।
- टैक्स छूट नहीं: ये डिपॉजिट्स इनकम टैक्स एक्ट के सेक्शन 80C के तहत टैक्स डिडक्शन के लिए भी योग्य नहीं होते हैं।
कुछ मामलों में, सरकार बाद में ये इरेगुलर डिपॉजिट्स खाताधारक को वापस कर सकती है, जिससे अतिरिक्त निवेश का पूरा मकसद ही खत्म हो जाता है।
क्या होता है अगर कोई एक्शन न लिया जाए?
यह समझना ज़रूरी है कि 15 साल पूरे होने पर खाते के साथ क्या होता है। अगर निवेशक कोई कदम नहीं उठाता है, तो खाता अपने आप 5-5 साल के ब्लॉक में एक्सटेंड हो जाता है। इस स्थिति में, मौजूदा बैलेंस पर स्टैंडर्ड ब्याज मिलता रहता है, लेकिन खाताधारक कोई नया डिपॉजिट नहीं कर सकता। यह उन लोगों के लिए एक सुरक्षित तरीका है जो और पैसा लॉक नहीं करना चाहते और सिर्फ अपने जमा पैसों को बढ़ने देना चाहते हैं।
कब आती है दिक्कत?
मुश्किल तब आती है जब निवेशक 15 साल की अवधि के बाद भी अपनी बचत की आदत को सक्रिय रूप से जारी रखना चाहता है। ऐसे में, ज़रूरी है कि खाताधारक एक साल की समय-सीमा के भीतर ज़रूरी कागजी कार्रवाई पूरी करे।
जिन खाताधारकों के खाते पहले ही मैच्योर हो चुके हैं, उनके लिए यह सलाह दी जाती है कि वे तुरंत अपने बैंक या पोस्ट ऑफिस ब्रांच से संपर्क करके यह कन्फर्म करें कि उनका खाता एक्टिव मोड में है या पैसिव एक्सटेंशन मोड में।
निवेशकों को अपने खाते खोलने की तारीख का रिकॉर्ड रखना चाहिए ताकि मैच्योरिटी की सही तारीख पता चल सके। यह फाइनेंशियल ईयर के आधार पर कैलकुलेट होती है, न कि शुरुआती डिपॉजिट की कैलेंडर डेट के आधार पर। इन पेपर्स को सही रखना, इरेगुलर डिपॉजिट की परेशानी से बचाता है और लॉन्ग-टर्म सेविंग्स पर मिलने वाले टैक्स बेनिफिट्स को सुरक्षित करता है।
