साल 2026 में भारतीय रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले ऐतिहासिक निचले स्तर पर है। ऐसे में विदेश में पढ़ाई का सपना देख रहे परिवारों पर खर्च का बोझ बढ़ गया है। एक्सपर्ट्स का कहना है कि पढ़ाई के बजट में **10% से 20%** का एक्स्ट्रा इमरजेंसी फंड रखें और लोन लेते समय सोच-समझकर फैसला लें ताकि कर्ज का बोझ न बढ़े।
साल 2026 में विदेश जाकर पढ़ाई करना कई भारतीय परिवारों के लिए अब पहले के मुकाबले काफी महंगा हो गया है। ट्यूशन फीस में बढ़ोतरी और रुपए की गिरती कीमत के चलते विदेशी शिक्षा का सालाना खर्च लगभग 7% से 11% तक बढ़ गया है।
इमरजेंसी फंड (Contingency Buffer) की जरूरत
एक्सपर्ट्स के मुताबिक, सिर्फ ट्यूशन फीस का हिसाब लगाना काफी नहीं है। करेंसी मार्केट में उतार-चढ़ाव को देखते हुए, परिवारों को अपने कुल बजट का 10% से 20% हिस्सा एक अलग 'इमरजेंसी फंड' के तौर पर रखना चाहिए। यह बफर फंड फीस में बढ़ोतरी और करेंसी के खराब दौर में बच्चे की पढ़ाई को बीच में रुकने से बचाएगा।
लोन और एसेट की सुरक्षा
लोन लेते समय लोग अक्सर ज्यादा रकम लेने की गलती करते हैं। फाइनेंशियल सलाहकारों का कहना है कि आपकी मंथली EMI बच्चे के भविष्य के अनुमानित वेतन के 20% से ज्यादा नहीं होनी चाहिए। अगर आप 'सिक्योर्ड लोन' (संपत्ति गिरवी रखकर) ले रहे हैं, तो सावधान रहें। नौकरी मिलने में देरी होने पर आपके घर की संपत्ति दांव पर लग सकती है, इसलिए ब्याज बचाने के चक्कर में घर जोखिम में डालना महंगा पड़ सकता है।
नए विकल्पों की तलाश
बढ़ते खर्चों को देखते हुए अब कई परिवार अमेरिका और कनाडा जैसे महंगे देशों की जगह जर्मनी जैसे यूरोपियन देशों को चुन रहे हैं, जहां पढ़ाई और खर्च का तालमेल बेहतर है। इसके अलावा, हाइब्रिड मॉडल—जिसमें 2 साल की पढ़ाई भारत में और बाकी विदेश में होती है—भी करेंसी जोखिम को कम करने का एक बेहतरीन तरीका साबित हो रहा है।
