Grant Thornton Bharat और Entrust Family Office की एक हालिया सर्वे रिपोर्ट ने चौंकाने वाले आंकड़े पेश किए हैं। देश के अमीर परिवारों में से महज **36%** ने ही आधिकारिक तौर पर सक्सेशन प्लानिंग (उत्तराधिकार योजना) बनाई है, जो लिस्टेड कंपनियों के शेयरधारकों के लिए एक बड़ा रिस्क हो सकता है।
निवेशकों के लिए 'की-मैन रिस्क' का खतरा
शेयर बाजार में निवेश करने वालों के लिए यह सर्वे एक चेतावनी की तरह है। इसे 'की-मैन रिस्क' (Key Man Risk) कहा जाता है। भारत की कई बड़ी कंपनियों में फैसले लेने की ताकत प्रमोटर या परिवार के पास ही केंद्रित होती है। यदि किसी अचानक घटना के कारण लीडरशिप में बदलाव आता है और उत्तराधिकार का कोई लिखित प्लान नहीं होता, तो कंपनी का कामकाज ठप हो सकता है, जिससे शेयर की कीमतों में भारी गिरावट और वैल्यू इरोजन (Value Erosion) का खतरा बढ़ जाता है।
गवर्नेंस और सेबी (SEBI) की सख्ती
लिस्टेड कंपनियों के लिए SEBI ने कॉरपोरेट गवर्नेंस के कड़े नियम लागू किए हैं, जिसमें बोर्ड डायवर्सिटी और सक्सेशन पॉलिसी जरूरी है। लेकिन सर्वे बताता है कि 'कागज पर' पॉलिसी होने और 'संकट के समय' उसे लागू करने के बीच एक बड़ी खाई है। आज भी कई परिवार केवल मौखिक या आपसी सहमति से काम चला रहे हैं, जो संस्थागत बाजार की जरूरतों के बिल्कुल उलट है।
पुरानी गलतियों से सबक
इतिहास गवाह है कि जब परिवारों के बीच उत्तराधिकार को लेकर अनबन हुई, तो उसका खामियाजा निवेशकों को उठाना पड़ा। ऐसी लड़ाइयां अक्सर National Company Law Tribunal (NCLT) तक पहुंचीं, जिससे कंपनी का फोकस अपने कोर बिजनेस से हट गया। मार्केट उन कंपनियों को हमेशा बेहतर रेटिंग देता है जिनके पास सक्सेशन के लिए पारदर्शी और स्पष्ट डॉक्यूमेंट्स होते हैं।
निवेशक क्या ट्रैक करें?
अगर आप किसी फैमिली-रन बिजनेस में निवेशित हैं, तो इन बातों पर नजर रखें:
- क्या अगली पीढ़ी को जिम्मेदारी सौंपने की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है?
- क्या कंपनी प्रोफेशनल CEO को नियुक्त कर रही है?
- क्या सालाना रिपोर्ट में ट्रांजिशन (Transition) टाइमलाइन का साफ जिक्र है?
जो कंपनियां पुरानी परंपराओं को छोड़कर प्रोफेशनल सेटअप अपना रही हैं, वही लंबी अवधि में निवेशकों का भरोसा जीतने में कामयाब होंगी।
