भारत में कई निवेशक यह गलती करते हैं कि नॉमिनी ही संपत्ति का असली मालिक है। सच तो यह है कि नॉमिनी सिर्फ एक केयरटेकर की तरह होता है। असली मालिकाना हक उत्तराधिकार कानून या वसीयत से तय होता है।
नॉमिनी सिर्फ एक कस्टोडियन
बैंक अकाउंट, म्यूचुअल फंड या इंश्योरेंस पॉलिसी में किसी को नॉमिनी बनाना वसीयत लिखने के बराबर नहीं है। कानूनी जानकारों और हालिया अदालती फैसलों के मुताबिक, नॉमिनी का मतलब एसेट का मालिक होना नहीं है। वह केवल एक ट्रस्टी या कस्टोडियन है, जो कानूनी वारिसों तक संपत्ति पहुँचने तक उसे संभालता है।
सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने 'शक्ति येजदानी बनाम जयानंद जयंत सालगांवकर' मामले में साफ कर दिया है कि नॉमिनेशन का मतलब उत्तराधिकार कानून को दरकिनार करना नहीं है। नॉमिनी की जिम्मेदारी है कि वह संपत्ति को कानूनी वारिसों, जैसे हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम या भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम के नियमों के अनुसार ही बांटे, यदि कोई वसीयत मौजूद नहीं है।
बैंकिंग और इंश्योरेंस की सुविधा
बैंक और इंश्योरेंस कंपनियां अक्सर डेथ सर्टिफिकेट मिलते ही पैसा नॉमिनी को दे देती हैं। यह केवल प्रशासनिक सुविधा है ताकि खाता बंद हो सके। इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि पैसा नॉमिनी का है। यदि परिवार के अन्य सदस्य इस पर दावा करते हैं, तो नॉमिनी कानूनी मुसीबत में फंस सकता है।
वसीयत (Will) क्यों है अनिवार्य?
वसीयत आपके धन के बंटवारे का एकमात्र स्पष्ट रोडमैप है। इसके बिना, आपकी मृत्यु के बाद संपत्ति का बंटवारा उत्तराधिकार के डिफॉल्ट नियमों के अनुसार होगा, जो आपके मन मुताबिक नहीं हो सकता। इससे परिवारों में लंबे समय तक चलने वाले कानूनी विवाद और तनाव पैदा होते हैं।
निवेशकों के लिए जरूरी सलाह
अपनी मेहनत की कमाई को सुरक्षित रखने के लिए दो कदम उठाएं:
- अपने सभी फाइनेंशियल इंस्ट्रूमेंट्स जैसे फिक्स्ड डिपॉजिट, शेयर और म्यूचुअल फंड में नॉमिनेशन को अपडेट रखें।
- एक विस्तृत वसीयत (Will) जरूर बनवाएं। इसे कानूनी पेशेवर से रजिस्टर करवाएं ताकि आपके जाने के बाद संपत्ति का बंटवारा बिना किसी विवाद के आपकी मर्जी के अनुसार हो सके।
