अक्टूबर 2026 में Nifty 50 के अपने **52-सप्ताह के निचले स्तर** पर पहुंचने से निवेशकों की चिंता बढ़ गई है। बाजार में भारी गिरावट के बीच यह स्पष्ट हो गया है कि मार्केट-कैप आधारित फंड्स में निवेश करना कितना जोखिम भरा हो सकता है।
भारतीय शेयर बाजार के लिए अक्टूबर का महीना काफी उठापटक भरा रहा है। 8 अक्टूबर, 2026 को Nifty 50 इंडेक्स गिरकर 22,179.90 के ताजा 52-सप्ताह के निचले स्तर पर पहुंच गया। एफआईआई (FII) की बिकवाली और मैक्रो-इकोनॉमिक दबावों के कारण बाजार में यह गिरावट आई है। यह स्थिति उन निवेशकों के लिए एक चेतावनी है, जिनकी पूंजी केवल कुछ गिने-चुने लार्ज-कैप शेयरों में ही फंसी हुई है।
कंसंट्रेशन का जाल
मार्केट-कैप वेटेड इंडेक्स में उन कंपनियों का वजन (weight) सबसे ज्यादा होता है जिनका मार्केट वैल्यू सबसे अधिक है। बुल मार्केट में यह रणनीति अच्छी चलती है, लेकिन गिरावट के दौरान यह एक 'स्ट्रक्चरल ट्रैप' साबित होती है। यदि इंडेक्स को चलाने वाले कुछ प्रमुख आईटी या फाइनेंशियल सेक्टर के शेयर गिरते हैं, तो पूरे इंडेक्स का प्रदर्शन खराब हो जाता है। जुलाई 2026 के आंकड़ों के अनुसार, जहां Nifty 50 का एक साल का रिटर्न -2.3% रहा, वहीं Nifty 50 Equal Weight इंडेक्स ने 8.2% का पॉजिटिव रिटर्न दिया है।
डायवर्सिफिकेशन के नए तरीके
जोखिम को कम करने के लिए अब निवेशक अन्य एसेट क्लासेस की ओर देख रहे हैं। सोना (Gold) हमेशा से ही बाजार की अस्थिरता के खिलाफ एक 'हेज' (hedge) रहा है। गोल्ड ईटीएफ (Gold ETFs) और सॉवरेन गोल्ड बॉन्ड्स (Sovereign Gold Bonds) के माध्यम से निवेशक अपने पोर्टफोलियो को सुरक्षित रख सकते हैं। इसके अलावा, मल्टी-एसेट एलोकेशन फंड्स भी एक अच्छा विकल्प बनकर उभरे हैं, जो इक्विटी, डेट और कमोडिटी का मिश्रण पेश करते हैं।
आगे की रणनीति
बाजार की अनिश्चितता के बीच, निवेशकों को अपने पोर्टफोलियो का 'ओवरलैप' ऑडिट करना चाहिए। यदि आपका निवेश मुख्य रूप से इंडेक्स के टॉप 10 शेयरों में ही केंद्रित है, तो आप बाजार की गिरावट के प्रति बहुत ज्यादा संवेदनशील हैं। अब निवेशकों को आरबीआई (RBI) की अगली पॉलिसी और मिड-कैप व स्मॉल-कैप शेयरों के प्रदर्शन पर नजर बनाए रखनी चाहिए।
