नेशनल पेंशन सिस्टम (NPS) ने रिटायरमेंट इनकम स्कीम (RIS) के साथ सिस्टमैटिक पेआउट रेट (SPR) पेश किया है। यह नई व्यवस्था रिटायरमेंट के बाद नियमित आय सुनिश्चित करने और साथ ही जमा राशि को निवेशित रखकर बढ़ाने का मौका देती है। इसका मकसद महंगाई और बढ़ते मेडिकल खर्चों से निपटने में मदद करना है।
NPS की नई स्कीम: रिटायरमेंट प्लानिंग में बड़ा बदलाव
भारत में रिटायरमेंट प्लानिंग अब सिर्फ एकमुश्त रकम जमा करने से आगे बढ़ रही है। नेशनल पेंशन सिस्टम (NPS) की नई रिटायरमेंट इनकम स्कीम (RIS) और सिस्टमैटिक पेआउट रेट (SPR) का कॉम्बिनेशन, रिटायर होने वालों के लिए एक नया रास्ता खोल रहा है। यह स्कीम मंथली इनकम और लॉन्ग-टर्म कैपिटल को सुरक्षित रखने की दोहरी ज़रूरत को पूरा करने के लिए डिज़ाइन की गई है। यह लोगों को बचत खत्म होने के डर (longevity risk) और महंगाई के मार से बचाने में मदद करेगी।
RIS और SPR कैसे काम करते हैं?
इस स्कीम का मुख्य उद्देश्य कैपिटल ग्रोथ को रेगुलर कैश फ्लो के साथ बैलेंस करना है। पहले, रिटायर होने वाले अक्सर अपनी सारी जमा-पूंजी फिक्स्ड-इनकम इंस्ट्रूमेंट्स में लगा देते थे, जिससे सुरक्षा तो मिलती थी पर ग्रोथ सीमित रह जाती थी। लेकिन नई RIS और SPR मॉडल में, लोग अपने पेंशन कॉर्पस से सिस्टमैटिक तरीके से पैसे निकाल सकते हैं, और कुछ हिस्सा मार्केट-लिंक्ड एसेट्स में निवेशित रख सकते हैं। इससे बची हुई रकम बढ़ने की संभावना बनी रहती है, जो भविष्य में ज़्यादा पेआउट का आधार बन सकती है।
एक उदाहरण से समझें
मान लीजिए एक व्यक्ति ने ₹3 करोड़ का कॉर्पस जमा किया है। एक आम रणनीति यह होती है कि इसमें से कुछ हिस्सा तुरंत ज़रूरतों, जैसे इमरजेंसी फंड और हेल्थकेयर पर खर्च करने के लिए अलग रख दिया जाए। बाकी रकम को NPS स्ट्रक्चर में लगाया जाता है। पेआउट शुरू होने से कुछ साल पहले इस रकम को बढ़ने का मौका देने से, एक बड़ा कॉर्पस तैयार हो सकता है। जब पेआउट शुरू होता है, तो एन्युटी पेमेंट्स और RIS-SPR से होने वाली सिस्टेमैटिक विड्रॉल्स का कॉम्बिनेशन, मंथली इनकम को इस तरह स्ट्रक्चर कर सकता है कि वह समय के साथ बढ़ती रहे। एक अनुमान के मुताबिक, अगर कोई व्यक्ति 65 साल की उम्र तक अपने कॉर्पस को लगभग ₹2.6 करोड़ तक बढ़ा लेता है, तो एन्युटी और RIS-SPR के इंटीग्रेटेड इस्तेमाल से लगभग ₹1.55 लाख प्रति माह की आय हो सकती है।
लॉन्ग-टर्म रिस्क से बचाव
यह स्कीम उन लोगों के लिए काफ़ी उपयोगी है जो बढ़ती महंगाई और मेडिकल खर्चों से निपटना चाहते हैं। पेआउट में सालाना बढ़ोतरी का प्रावधान इसे स्टैंडर्ड फिक्स्ड-पेंशन प्रोडक्ट्स से अलग बनाता है, जो अक्सर महंगाई के आगे टिक नहीं पाते। इसके अलावा, रोज़मर्रा के खर्चों से ज़्यादा जो भी अतिरिक्त आय होती है, उसे मल्टी-एसेट म्यूचुअल फंड जैसे डाइवर्सिफाइड एसेट्स में री-इन्वेस्ट किया जा सकता है। यह रिटायरमेंट के बाद के चरणों के लिए एक अतिरिक्त फाइनेंशियल कुशन तैयार करता है।
निवेशकों को क्या देखना चाहिए?
इस स्कीम पर विचार करते समय, रिटायर होने वाले लोगों को एन्युटी प्रोवाइडर का चुनाव, NPS के अंदर एसेट एलोकेशन और पेआउट रेट की स्थिरता जैसे फैक्टर्स पर ध्यान देना होगा। चूँकि इसमें मार्केट-लिंक्ड कंपोनेंट्स शामिल हैं, इसलिए पोर्टफोलियो परफॉर्मेंस के आधार पर मंथली इनकम में उतार-चढ़ाव हो सकता है। नए यूज़र्स को RIS और SPR की खास शर्तों, जैसे विड्रॉल्स पर टैक्स का असर और अनिवार्य एन्युटी पोर्शन को ध्यान से देखना चाहिए, ताकि यह उनकी व्यक्तिगत फाइनेंशियल लक्ष्यों के अनुरूप हो।
