अगर आप नॉन-रेजिडेंट इंडियन (NRI) हैं और भारत में आपकी कमाई बेसिक एग्जम्प्शन लिमिट से ज़्यादा है, तो 31 जुलाई तक इनकम टैक्स रिटर्न (ITR) फाइल करना आपके लिए ज़रूरी है। ऐसा न करने पर आपको पेनल्टी देनी पड़ सकती है। ITR फाइल करने से आप एक्स्ट्रा TDS का रिफंड पा सकते हैं और कैपिटल लॉस को आगे के लिए कैरी-फॉरवर्ड कर सकते हैं।
क्या है ITR फाइल करने की आखिरी तारीख?
नॉन-रेजिडेंट इंडियंस (NRIs) के लिए भारत में टैक्स के नियम थोड़े अलग होते हैं। अगर आपकी भारत में कमाई बेसिक एग्जम्प्शन लिमिट से ज़्यादा है, तो आपको इनकम टैक्स रिटर्न (ITR) फाइल करना अनिवार्य है। आपकी कमाई में प्रॉपर्टी से रेंट, NRO अकाउंट पर ब्याज, डिविडेंड और इंडियन सिक्योरिटीज या रियल एस्टेट की बिक्री से कैपिटल गेन शामिल हो सकता है। यह नियम तब भी लागू होता है जब आपका TDS पहले ही कट चुका हो।
सिर्फ इतना ही नहीं, कुछ खास ट्रांजैक्शन थ्रेशोल्ड भी ITR फाइलिंग को अनिवार्य बनाते हैं, भले ही आपकी कमाई कितनी भी हो। अगर किसी NRI ने एक फाइनेंशियल ईयर में सेविंग अकाउंट में ₹50 लाख से ज़्यादा जमा किए हैं या करंट अकाउंट में ₹1 करोड़ से ज़्यादा जमा किए हैं, तो ITR फाइल करना ज़रूरी है। 31 जुलाई की डेडलाइन मिस करने पर ₹1,000 से लेकर ₹5,000 तक की लेट फाइलिंग पेनल्टी लग सकती है।
ITR फाइल करने के बड़े फायदे
भले ही आपकी कुल इंडियन इनकम टैक्स एग्जम्प्शन लिमिट से कम हो, फिर भी ITR फाइल करना फायदेमंद साबित हो सकता है। सबसे बड़ा फायदा है एक्स्ट्रा TDS का रिफंड क्लेम करना। अक्सर प्रॉपर्टी बेचते समय, कैपिटल गेन की बजाय कुल बिक्री मूल्य पर TDS कट जाता है, जिससे ज़्यादा टैक्स कट जाता है। इसी तरह, रेंटल इनकम पर भी 31.2% की दर से TDS कटता है। अगर आपकी कुल इनकम टैक्स एग्जम्प्ट है, तो ITR फाइल करके ही आप इस एक्स्ट्रा कटे टैक्स को वापस पा सकते हैं।
एक और बड़ा फायदा है कैपिटल लॉस को कैरी-फॉरवर्ड करने की सुविधा। अगर आपने शेयर, म्यूचुअल फंड या प्रॉपर्टी बेचकर कोई लॉस उठाया है, तो आप उसे अगले 8 सालों तक अपने फ्यूचर कैपिटल गेन से सेट-ऑफ कर सकते हैं। लेकिन, इनकम टैक्स एक्ट के तहत यह तभी मुमकिन है जब आप ITR तय ड्यू डेट तक फाइल करें। फाइलिंग न करने पर आप भविष्य में टैक्स बचाने का यह मौका गंवा देंगे।
भविष्य के लिए आसान ट्रांजैक्शन
टैक्स रिफंड और लॉस एडजस्टमेंट के अलावा, लगातार ITR फाइल करने से आपका एक क्लियर फाइनेंशियल रिकॉर्ड बनता है। यह भविष्य में इंडियन अथॉरिटीज और फाइनेंशियल इंस्टीट्यूशंस के साथ डील करने में काफी मदद करता है। प्रॉपर्टी बेचने वालों के लिए, फाइल किए गए रिटर्न्स का रिकॉर्ड लोअर या निल TDS सर्टिफिकेट पाने में मदद कर सकता है, जिससे फौरन ज़्यादा टैक्स कटने से बच जाते हैं। साथ ही, लोन या क्रेडिट कार्ड एप्लीकेशन के लिए बैंक अक्सर पिछले ITRs को इनकम प्रूफ के तौर पर मांगते हैं। ये रिकॉर्ड्स भारत से बाहर पैसा भेजने (Repatriation) या विदेशी टैक्स क्रेडिट क्लेम करने में भी ज़रूरी डॉक्यूमेंट का काम करते हैं।
