अगर आप एक NRI हैं और दूसरे NRI को अपनी भारतीय संपत्ति बेचना चाहते हैं, तो TDS और FEMA नियमों का पालन बेहद जरूरी है। लोअर डिडक्शन सर्टिफिकेट (LDC) और सही टैक्स प्लानिंग से आप अपनी नकदी को बेहतर तरीके से मैनेज कर सकते हैं।
जब एक NRI दूसरे NRI को संपत्ति बेचता है, तो कानूनी और टैक्स संबंधी पेचीदगियां बढ़ जाती हैं। इस लेनदेन में TDS और FEMA के नियमों का सख्ती से पालन करना अनिवार्य है, वरना रजिस्ट्रेशन की प्रक्रिया फंस सकती है। इस सौदे में खरीदार की जिम्मेदारी टैक्स काटने की होती है, जिसके लिए खरीदार के पास वैलिड PAN कार्ड होना जरूरी है।
TDS का गणित
विक्रेता के लिए सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा TDS है। यदि संपत्ति को 24 महीने से अधिक समय तक रखा गया है, तो खरीदार को 12.5% TDS काटना होगा। वहीं, 24 महीने या उससे कम समय के लिए रखे गए एसेट पर यह दर 30% तक हो सकती है। अगर आपको लगता है कि आपकी वास्तविक टैक्स लायबिलिटी कम है, तो आप 'असेसिंग ऑफिसर' से 'लोअर डिडक्शन सर्टिफिकेट' (LDC) के लिए आवेदन कर सकते हैं। यह सर्टिफिकेट सेल से पहले मिलने पर आपका कैश फ्लो बेहतर बना रहता है।
टैक्स बचाने के स्मार्ट तरीके
टैक्स के बोझ को कम करने के लिए आप इनकम टैक्स एक्ट की Section 54 का उपयोग कर सकते हैं, जिसमें लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन्स को नई रेजिडेंशियल प्रॉपर्टी में निवेश किया जा सकता है। इसके अलावा, Section 54EC के तहत NHAI या REC के बॉन्ड्स में निवेश करके भी टैक्स बेनिफिट लिया जा सकता है। याद रखें, इन निवेशों के बावजूद शुरुआती TDS की रिकंसीलेशन फाइलिंग के दौरान करना जरूरी है।
विदेशों में पैसा भेजना (Repatriation)
FEMA गाइडलाइंस के तहत पैसे को विदेशी अकाउंट में भेजना एक अलग प्रक्रिया है। इसके लिए सेल डीड और निवेश के सोर्स के प्रमाण जैसे दस्तावेज जरूरी हैं। सालाना $1 मिलियन USD की सीमा तक फंड ट्रांसफर किया जा सकता है, बशर्ते सभी टैक्स देनदारियां पूरी कर ली गई हों। ऑथोराइज्ड डीलर बैंक इन ट्रांसफर के लिए गेटकीपर की भूमिका निभाते हैं, इसलिए सौदे से पहले सभी दस्तावेजों को व्यवस्थित रखना समझदारी है।
