अगर आप सैलरीड हैं और फ्रीलांसिंग या कंसल्टिंग से एक्स्ट्रा कमाई कर रहे हैं, तो सावधान हो जाएं। इनकम टैक्स डिपार्टमेंट की डिजिटल ट्रैकिंग अब काफी एडवांस हो गई है। सही ITR फॉर्म और इनकम कैटेगरी न चुनने पर आपको भारी पेनल्टी का सामना करना पड़ सकता है।
भारत में अब बड़ी संख्या में सैलरीड प्रोफेशनल फ्रीलांसिंग, कंटेंट क्रिएशन या कंसल्टिंग के जरिए सेकेंडरी इनकम कमा रहे हैं। हालांकि यह वित्तीय मजबूती देता है, लेकिन इसके साथ टैक्स फाइलिंग की जिम्मेदारी भी बढ़ जाती है। कई लोग यह गलतफहमी पाल लेते हैं कि छोटी-मोटी एक्स्ट्रा कमाई पर टैक्स नहीं देना पड़ता, जबकि कानूनन हर तरह की कमाई का खुलासा करना अनिवार्य है।\n\n### इनकम को सही हेड में दिखाएं\n\nआपकी साइड इनकम किस तरह की है, यह तय करता है कि उसे कैसे फाइल करना है। अगर काम रेगुलर है और प्रॉफिट कमाने के मकसद से है, तो इसे 'Profits and Gains of Business or Profession' के तहत दिखाया जाना चाहिए। इसे भूलकर भी 'Income from Other Sources' में न डालें। ध्यान रहे, रेगुलर सैलरी फाइल करने वाले लोग अक्सर ITR-1 भरते हैं, लेकिन बिजनेस इनकम होने पर आपको ITR-3 या ITR-4 चुनना होगा।\n\n### प्रिजम्प्टिव टैक्सेशन स्कीम का विकल्प\n\nछोटे फ्रीलांसरों और कंसल्टेंट्स के लिए 'प्रिजम्प्टिव टैक्सेशन' (Presumptive Taxation) काफी फायदेमंद है। सेक्शन 44ADA के तहत आप अपनी कुल कमाई का 50% हिस्सा टैक्स योग्य बता सकते हैं। इसी तरह, अन्य बिजनेस के लिए सेक्शन 44AD उपलब्ध है। इसमें आपको भारी-भरकम एकाउंट्स बुक मेंटेन करने की जरूरत नहीं होती। हालांकि, अगर आपका खर्च ज्यादा है, तो रेगुलर तरीका चुनना बेहतर हो सकता है, जहां आप वास्तविक खर्च घटाकर नेट टैक्सेबल इनकम निकाल सकते हैं।\n\n### डिजिटल ट्रैकिंग और रिस्क\n\nइनकम टैक्स डिपार्टमेंट अब 'Annual Information Statement' (AIS) और 'Form 26AS' के जरिए आपके हर वित्तीय लेनदेन पर नजर रखता है। अगर आपकी फाइलिंग में और बैंक स्टेटमेंट में अंतर पाया जाता है, तो नोटिस मिलना तय है।\n\nइसके अलावा, अगर आपका टर्नओवर ₹20 लाख से ज्यादा हो जाता है, तो GST रजिस्ट्रेशन अनिवार्य हो जाता है। साथ ही, अपनी कंपनी के एम्प्लॉयमेंट कॉन्ट्रैक्ट को भी चेक करें कि कहीं वह दूसरी कमाई पर रोक तो नहीं लगाता। इनकम छुपाने पर सेक्शन 270A के तहत भारी जुर्माना लग सकता है। समय रहते अपना एडवांस टैक्स भरें और खर्चों का सही हिसाब रखें ताकि साल के अंत में ब्याज का बोझ न पड़े।
