अपनों के गुजर जाने के बाद उनके फाइनेंशियल एसेट्स को सेटल करना एक बड़ी चुनौती हो सकता है। अगर आपने सही समय पर कदम नहीं उठाए, तो कानूनी अड़चनें आ सकती हैं। **7 साल** तक दावा न करने पर संपत्ति Investor Protection Fund में चली जाती है।
किसी प्रियजन के निधन के बाद उनके फाइनेंशियल एसेट्स, जैसे बैंक अकाउंट और डिमैट अकाउंट को मैनेज करना परिवार के लिए पहली प्राथमिकता होनी चाहिए। सबसे जरूरी नियम यह है कि मृतक के अकाउंट्स में कोई भी ट्रांजेक्शन न करें। उनके एटीएम कार्ड, चेकबुक या नेट बैंकिंग लॉगिन का उपयोग करना कानूनी रूप से गलत है और इससे कानूनी उत्तराधिकारियों (Legal Heirs) के लिए बड़ी मुसीबतें खड़ी हो सकती हैं।
जरूरी दस्तावेज और प्रक्रिया
संपत्ति का दावा इस बात पर निर्भर करता है कि क्या मृतक ने कोई वसीयत (Will) छोड़ी है। यदि वसीयत मौजूद है, तो नामित निष्पादक (Executor) की जिम्मेदारी है कि वह डेथ सर्टिफिकेट और जरूरी कानूनी दस्तावेज पेश करे। बैंक द्वारा दस्तावेज स्वीकार किए जाने के बाद, संपत्ति को लाभार्थियों के बीच बांटने तक मैनेज करने के लिए एक एस्टेट अकाउंट खोला जा सकता है।
अगर वसीयत नहीं है, तो उत्तराधिकारियों को अपना रिश्ता साबित करने वाले कानूनी दस्तावेज बैंक या डिपॉजिटरी पार्टिसिपेंट के पास जमा करने होंगे। ध्यान रहे, अकाउंट होल्डर की मृत्यु के बाद होने वाली इनकम जैसे ब्याज या डिविडेंड पर टैक्स चुकाने की जिम्मेदारी उत्तराधिकारियों की ही होती है।
सात साल का सबसे बड़ा जोखिम
खाते बंद करने की कोई तय समय सीमा नहीं है, लेकिन देरी करना जोखिम भरा है। अगर कोई खाता 7 साल तक निष्क्रिय (Dormant) रहता है, तो नियमों के मुताबिक बैंक या फाइनेंशियल संस्थान उस फंड और सिक्योरिटीज को Investor Protection Fund में ट्रांसफर कर देते हैं। एक बार संपत्ति वहां पहुंच गई, तो उसे वापस पाने की प्रक्रिया बेहद लंबी और जटिल हो जाती है। इसलिए, डेथ सर्टिफिकेट मिलने के तुरंत बाद मालिकाना हक ट्रांसफर करने की प्रक्रिया शुरू कर देना ही समझदारी है।
