लग्जरी कार के सपने में अक्सर लोग लंबी अवधि के EMI के जाल में फंस जाते हैं और डिप्रिसिएशन (depreciation) की मार को नजरअंदाज कर देते हैं। अपनी जेब को सुरक्षित रखने के लिए 20/4/10 का नियम अपनाना जरूरी है।
लग्जरी गाड़ी खरीदते वक्त शोरूम में अक्सर बातचीत का केंद्र केवल 'ईएमआई' (EMI) होता है। डीलर अक्सर लोन का टेन्योर (tenure) बढ़ा देते हैं ताकि किस्त छोटी दिखे, लेकिन यह तरीका कुल इंटरेस्ट (interest) के बोझ और लंबे समय तक कैश फ्लो पर पड़ने वाले असर को छिपा देता है। मान लीजिए अगर गाड़ी की ऑन-रोड कीमत ₹50 लाख है, तो 7 साल का लोन आपकी कमाई का एक बड़ा हिस्सा लंबे समय तक के लिए ब्लॉक कर देता है, जबकि गाड़ी की वैल्यू तेजी से गिरती है।
20/4/10 का मंत्र
फाइनेंशियल एक्सपर्ट्स एक सुरक्षित दायरे के लिए 20/4/10 का नियम सुझाते हैं:
- 20%: गाड़ी की कुल कीमत का कम से कम 20% डाउन पेमेंट करें।
- 4: लोन का समय 4 साल से ज्यादा न रखें।
- 10: कुल खर्च (EMI, फ्यूल, इंश्योरेंस और मेंटेनेंस) आपकी ग्रॉस मंथली इनकम के 10% से ज्यादा नहीं होना चाहिए।
यह नियम आपको जमीनी हकीकत का अहसास कराता है कि क्या आप वाकई उस गाड़ी को अफोर्ड कर सकते हैं या नहीं।
डिप्रिसिएशन और नेगेटिव इक्विटी का रिस्क
लग्जरी कार एक 'डिप्रिसिएटिंग एसेट' (depreciating asset) है। यदि आप कम डाउन पेमेंट और लंबे लोन पर गाड़ी लेते हैं, तो आप 'नेगेटिव इक्विटी' में फंस सकते हैं—यानी गाड़ी की मार्केट वैल्यू लोन की बची हुई राशि से कम हो जाती है। ऐसे में आपात स्थिति में गाड़ी बेचने पर भी आपको बैंक का कर्ज चुकाने के लिए अपनी जेब से पैसा देना पड़ सकता है।
अवसर लागत (Opportunity Cost)
याद रखें, कार में लगाया गया हर रुपया वह पैसा है जो म्यूच्यूअल फंड (mutual fund) या स्टॉक (stock) जैसे वेल्थ क्रिएटर एसेट्स में लग सकता था। लोन की किस्त चुकाने के लिए अपनी भविष्य की सैलरी पर निर्भर रहना आपके रिटायरमेंट और बच्चों की शिक्षा जैसे बड़े लक्ष्यों को प्रभावित कर सकता है। गाड़ी खरीदने से पहले लोन पर जाने वाले कुल ब्याज की गणना जरूर करें और दिखावे से ज्यादा अपनी फाइनेंशियल हेल्थ को प्राथमिकता दें।
