बच्चों के नाम पर म्यूचुअल फंड और इंश्योरेंस में निवेश करना भविष्य के लिए अच्छा है, लेकिन इसके कुछ कानूनी नियम हैं। 18 साल की उम्र होते ही निवेश में क्या बदलाव आते हैं और इंश्योरेंस में 'Appointee' का महत्व क्या है, इसे जानना बेहद जरूरी है।
बच्चों के भविष्य को सुरक्षित करने के लिए उनके नाम पर निवेश करना एक समझदारी भरा कदम है, लेकिन भारत में इसके लिए कुछ खास रेग्युलेटरी नियम हैं जिनका पालन करना जरूरी है।
म्यूचुअल फंड अकाउंट मैनेजमेंट
जब आप किसी नाबालिग (Minor) के नाम पर म्यूचुअल फंड में निवेश करते हैं, तो कानूनी तौर पर बच्चा ही उस अकाउंट का मालिक होता है। हालांकि, बच्चा खुद अकाउंट ऑपरेट नहीं कर सकता, इसलिए माता-पिता या कानूनी अभिभावक (Guardian) इसे मैनेज करते हैं। अकाउंट खोलने के लिए बच्चे की जन्मतिथि का प्रमाण और अभिभावक का KYC पूरा करना अनिवार्य होता है।
18 साल की उम्र और निवेश में बदलाव
जैसे ही बच्चा 18 साल का होता है, अकाउंट ऑटोमैटिक रूप से 'फ्रीज' (Freeze) हो जाता है। इसका मतलब है कि अब अकाउंट की कमान बच्चे के हाथ में होनी चाहिए। इस स्टेज पर SIP (सिस्टमैटिक इन्वेस्टमेंट प्लान) अपने आप रुक जाते हैं। अकाउंट को फिर से चालू करने के लिए बच्चे को अपना नया KYC कराना होगा और बैंक डिटेल्स अपडेट करनी होंगी। अगर आप इस प्रक्रिया में देरी करते हैं, तो पैसे निकालने (Liquidity) में मुश्किल आ सकती है।
इंश्योरेंस में 'Appointee' का महत्व
अगर आप अपनी लाइफ इंश्योरेंस पॉलिसी में किसी नाबालिग को नॉमिनी बनाते हैं, तो कानूनन वह सीधे क्लेम का पैसा नहीं ले सकता। इसके लिए आपको एक वयस्क को 'Appointee' के रूप में नियुक्त करना पड़ता है। यह व्यक्ति बच्चे के बालिग होने तक इंश्योरेंस की रकम को सुरक्षित रखता है। अगर आपने 'Appointee' का नाम नहीं जोड़ा है, तो क्लेम सेटलमेंट में बड़ी कानूनी दिक्कतें और देरी हो सकती है।
याद रखें, बच्चे के नाम निवेश केवल पैसे जमा करने तक सीमित नहीं है, बल्कि समय पर कागजी कार्रवाई पूरी करना भी उतना ही जरूरी है ताकि भविष्य में किसी भी तरह की परेशानी न हो।
