मालिकाना हक़: दिखावटी भागीदारी से आगे का रास्ता
ताज़ा रिपोर्ट्स बताती हैं कि भारत में महिलाओं की वित्तीय बाज़ारों में भागीदारी में ज़बरदस्त इज़ाफ़ा हुआ है। म्यूचुअल फंड्स और इन्वेस्टमेंट अकाउंट्स में उनकी मौजूदगी काफी बढ़ी है। मगर, एक गहराई से देखने पर पता चलता है कि असली वित्तीय सशक्तिकरण सिर्फ बाज़ार में हिस्सेदारी या जॉइंट अकाउंट से कहीं आगे है। सच्ची स्वायत्तता का सीधा संबंध एसेट्स (assets) पर मालिकाना हक़ और नियंत्रण से है, और इस मोर्चे पर भले ही प्रगति दिख रही है, लेकिन मंज़िल अभी दूर है। मिसाल के तौर पर, प्रॉपर्टी के मालिकाना हक़ की बात करें तो, केवल 13% महिलाएं ही घर की अकेली मालकिन हैं और 8% के पास ज़मीन है। हालांकि, रियल एस्टेट अभी भी महिलाओं के लिए संपत्ति बनाने और सुरक्षा का एक अहम ज़रिया बना हुआ है, जिसे लोन की आसान नीतियों और टैक्स छूट का सहारा भी मिल रहा है। इस तरह की टेंजिबल एसेट (tangible asset) पर कंट्रोल ज़रूरी है, क्योंकि 'नॉमिनी' (nominee) होने से सीधा मालिकाना हक़ मिलने वाली कानूनी सुरक्षा काफी कम होती है।
SIP का कमाल और समझदारी से निवेश: अंदाज़े नहीं, अनुशासन
सिस्टमैटिक इन्वेस्टमेंट प्लान्स (SIPs) महिलाओं के लिए संपत्ति बनाने का पसंदीदा ज़रिया बनकर उभरे हैं, जो संपत्ति बनाने के प्रति एक अनुशासित और लक्ष्य-केंद्रित नज़रिया दर्शाते हैं। महिलाओं के SIP अकाउंट्स की संख्या में भारी उछाल आया है, जो दिसंबर 2020 से दिसंबर 2024 के बीच 269.8% बढ़ी है। आंकड़े बताते हैं कि महिलाएं न केवल निवेश कर रही हैं, बल्कि पुरुषों से आगे भी निकल रही हैं। उनके SIP ट्रांजैक्शन वैल्यू (transaction value) 22% ज़्यादा हैं और लम्प-सम इन्वेस्टमेंट (lump-sum investment) 45% ज़्यादा हैं। यह दिखाता है कि महिलाएं केवल कंजर्वेटिव (conservative) नहीं हैं, बल्कि वे लंबी अवधि की स्थिर रणनीतियों को प्राथमिकता दे रही हैं। महिला निवेशक लंबी अवधि के निवेश के प्रति ज़्यादा प्रतिबद्धता दिखाती हैं, जहां पांच साल से ज़्यादा के निवेश का AUM (Assets Under Management) काफी बढ़ा है। शेयर (equity) और म्यूचुअल फंड्स की ओर यह सोची-समझी चाल, जो पारंपरिक फिक्स्ड डिपॉजिट (fixed deposit) और गोल्ड (gold) से आगे है, यह दर्शाती है कि उनका इन्वेस्टमेंट माइंडसेट (investment mindset) अब सट्टेबाजी के बजाय ग्रोथ (growth) पर केंद्रित हो रहा है।
आत्मविश्वास और साक्षरता की खाई पाटना
डिजिटल प्लेटफॉर्म्स और वित्तीय साक्षरता पहलों के ज़रिए पहुंच बढ़ने के बावजूद, दुनिया भर में और भारत में भी महिलाओं के बीच वित्तीय साक्षरता (financial literacy) में एक उल्लेखनीय जेंडर गैप (gender gap) बरकरार है, जिसमें महिलाएं पुरुषों की तुलना में कम स्कोर करती हैं। यह ज्ञान की कमी, सामाजिक मान्यताओं और आत्मविश्वास की कमी – जिसे अक्सर 'वित्तीय साक्षरता-आत्मविश्वास का गठजोड़' (financial literacy-confidence nexus) कहा जाता है – महिलाओं को अपने वित्तीय ज्ञान पर अमल करने से रोक सकती है। शुरूआती चर्चाओं में बताए गए 'डराने' वाला फैक्टर (intimidation factor) वास्तविक है, जिसके कारण कुछ बहुत ज़्यादा रूढ़िवादी हो जाती हैं, जबकि कुछ बिना पूरी समझ के हाई-रिस्क ट्रेडिंग (high-risk trading) में शामिल हो जाती हैं। हालांकि, स्वतंत्र वित्तीय निर्णय लेने वाली महिलाओं की संख्या लगातार बढ़ रही है, खासकर सेल्फ-एम्प्लॉयड (self-employed) महिलाओं के मामले में। महिला श्रम बल की भागीदारी का बढ़ना, जो 2017-18 में 23.3% से बढ़कर 2023-24 में 41.7% हो गया है, सीधे तौर पर इस बढ़ती स्वायत्तता से जुड़ा हुआ है।
सबसे बड़ी रुकावटें: जड़ें जमाए हुए ढांचागत मुद्दे
भारत में महिलाओं के लिए सच्ची वित्तीय स्वतंत्रता का रास्ता कई ढांचागत और सामाजिक चुनौतियों से भरा हुआ है। पितृसत्तात्मक मान्यताएं (patriarchal norms) अभी भी संपत्ति पर महिलाओं के हक़ और नियंत्रण को सीमित करती हैं, जिससे उनकी संपत्ति का लाभ उठाने की क्षमता बाधित होती है। इसके अलावा, बहुत सी महिलाओं के लिए औपचारिक वित्तीय सलाह, परामर्श और गैर-वित्तीय सेवाओं तक पहुंच अभी भी कमजोर है। वित्तीय संस्थानों ने ऐतिहासिक रूप से महिला-केंद्रित व्यवसायों के प्रति संदेह दिखाया है, और परिवार व व्यापक इकोसिस्टम (ecosystem) के भीतर जेंडर बायस (gender biases) विविधीकरण (diversification) और सक्रिय वित्तीय प्रबंधन में बाधा डालते हैं। औपचारिक शिक्षा या पेशेवर सलाहकारों के बजाय वित्तीय मार्गदर्शन के लिए पुरुष परिवार के सदस्यों पर निर्भरता अभी भी एक महत्वपूर्ण बाधा बनी हुई है। ये ढांचागत मुद्दे बताते हैं कि, भले ही ऊपरी तौर पर भागीदारी बढ़ रही हो, लेकिन निष्पक्ष वित्तीय सशक्तिकरण सुनिश्चित करने के लिए गहरे ढांचागत सुधारों की आवश्यकता है।
आगे का नज़रिया: वास्तविक वित्तीय स्वायत्तता की ओर
भारत के आर्थिक विकास को उसकी महिला आबादी तेजी से आकार दे रही है। जैसे-जैसे महिलाएं अधिक डिस्पोजेबल इनकम (disposable income) हासिल कर रही हैं और एक अधिक डिजिटल दुनिया में कदम रख रही हैं, निवेशक और संपत्ति निर्माता के रूप में उनकी भूमिका बढ़ने वाली है। मार्च 2024 तक पांच वर्षों में म्यूचुअल फंड्स में महिलाओं द्वारा रखे गए AUM (Assets Under Management) में दोगुना से अधिक की वृद्धि इस तेज़ ट्रेंड की ओर इशारा करती है। हालांकि, अब ध्यान भागीदारी के मेट्रिक्स (metrics) से हटकर नियंत्रण की गहराई और रणनीतिक निर्णय लेने पर जाना चाहिए। वास्तविक वित्तीय स्वतंत्रता तब ही हासिल होगी जब महिलाएं न केवल निवेश करेंगी, बल्कि अपनी संपत्ति की मालिक होंगी, उसे नियंत्रित करेंगी और रणनीतिक रूप से प्रबंधित करेंगी, जिसे मजबूत वित्तीय साक्षरता, आत्मविश्वास बढ़ाने वाले उपायों और लगातार बनी हुई सामाजिक व ढांचागत बाधाओं को दूर करने का समर्थन प्राप्त होगा। यह यात्रा शुरू हो चुकी है, लेकिन पूर्ण वित्तीय स्वायत्तता के गंतव्य तक पहुंचने के लिए लगातार, लक्षित प्रयासों की ज़रूरत है।