OmniScience Insights Labs की एक नई रिपोर्ट भारत में रिटायरमेंट सेविंग्स (Retirement Savings) के भविष्य पर चिंता की घंटी बजा रही है। "How inflation and longevity shape retirement outcomes" नाम की इस रिपोर्ट में कहा गया है कि रिटायरमेंट पोर्टफोलियो (Retirement Portfolio) का स्ट्रक्चर (structure) सिर्फ जमा की गई रकम (corpus) से ज़्यादा मायने रखता है। यह रिपोर्ट उन लाखों लोगों को आईना दिखाती है जो पारंपरिक बचत योजनाओं पर निर्भर हैं और बताती है कि कैसे बढ़ती महंगाई और जीवन प्रत्याशा (life expectancy) के साथ ये योजनाएं नाकाफी साबित हो रही हैं। अब वक़्त आ गया है कि हम अपने निवेश की रणनीति को पूरी तरह बदलें और ज़्यादा लचीला (resilient) बनाएं।
महंगाई और लंबी उम्र का दोहरा वार
रिपोर्ट ने तीन बड़े खतरों का ज़िक्र किया है जो भारतीय रिटायरमेंट सेविंग्स पर मंडरा रहे हैं। पहला है महंगाई (inflation)। सोचिए, आज अगर आपके महीने का खर्च ₹1 लाख है, तो 10 साल बाद 6% की सालाना महंगाई दर से यह लगभग ₹1.8 लाख हो जाएगा। यानी आपकी कमाई की ताकत तेज़ी से घट रही है। दूसरा बड़ा खतरा है लोगों का लंबा जीना। 2023 तक भारत में औसत जीवन प्रत्याशा (average life expectancy) लगभग 72 वर्ष तक पहुंच गई है, और कई लोग 80 या 90 साल तक जीना चाहते हैं। इसका मतलब है कि रिटायरमेंट का पीरियड 25-30 वर्ष या उससे भी ज़्यादा हो सकता है। ऐसे में पुरानी प्लानिंग जो कम उम्र के हिसाब से की जाती थी, अब काम नहीं आएगी। तीसरा खतरा है 'सीक्वेंस ऑफ रिटर्न्स रिस्क' (sequence of returns risk), जिसमें अगर रिटायरमेंट के शुरुआती सालों में ही मार्केट में गिरावट आ जाए, तो आपकी जमा-पूंजी पर इसका बुरा असर लंबे समय तक रह सकता है, भले ही बाद में मार्केट सुधर जाए। ये सब मिलकर आपकी बचत को समय से पहले खत्म कर सकते हैं।
पारंपरिक साधन पड़ रहे कमज़ोर
रिपोर्ट में आम भारतीय रिटायरमेंट साधनों जैसे फिक्स्ड डिपॉजिट (FDs), लाइफ एन्युटी (Life Annuities) और सिस्टेमैटिक विथड्रॉल प्लान (SWPs) का विश्लेषण किया गया है। एक ₹1 करोड़ के Corpus पर 40 साल के लिए इन साधनों का हिसाब लगाया गया। FDs से जहां सुरक्षा मिलती है, पर ये महंगाई को मात नहीं दे पातीं। ₹6 लाख सालाना आय के लिए ₹2.3 करोड़ का Corpus चाहिए होगा। लाइफ एन्युटी लंबी उम्र का रिस्क खत्म करती हैं, पर इनमें मिलने वाली एक जैसी रकम की कीमत महंगाई में घट जाती है, इसके लिए भी ₹2.36 करोड़ का Corpus चाहिए। SWPs में मार्केट का ग्रोथ मिलता है, पर ये मार्केट पर बहुत निर्भर करते हैं। खराब मार्केट में ये जल्दी खत्म हो सकते हैं, और इन्हें बचाने के लिए करीब ₹1.6 करोड़ की ज़रूरत होगी। साफ है, इन पारंपरिक तरीकों से या तो बहुत बड़ा Corpus चाहिए या फिर जमा-पूंजी खत्म होने का बड़ा खतरा है।
'ScientificPay': एक नया ढांचा
इन कमियों को दूर करने के लिए, OmniScience ने 'ScientificPay' नाम का एक नया ढांचा (framework) पेश किया है। इसमें निवेश का 75% हिस्सा इक्विटी (equity) और 25% हिस्सा डेट (debt) में रखने का सुझाव है। इस स्ट्रक्चर का मकसद है कि जब मार्केट गिरे, तो पैसे निकालने के लिए डेट वाले हिस्से का इस्तेमाल हो, जिससे इक्विटी वाले हिस्से को लंबे समय तक बढ़ने का मौका मिले। हर साल मिलने वाली रकम पोर्टफोलियो की वैल्यू पर टिकी होगी, जिससे ग्रोथ भी बनी रहेगी। खराब से खराब मार्केट सिचुएशन का टेस्ट करने पर भी यह मॉडल ज़्यादा समय तक आय (income) देने में सक्षम पाया गया है। इस मॉडल में, ₹1 करोड़ का Corpus 100 साल की उम्र तक बढ़कर ₹14.4 करोड़ तक पहुंच सकता है। यह उस आम भारतीय तरीके से बिल्कुल अलग है, जहां लोग रिटायरमेंट के बाद इक्विटी में सिर्फ 10-20% ही रखते हैं।
मार्केट की चाल और निवेश का दांव
अभी भारतीय मार्केट काफी दिलचस्प है। BSE Sensex ऑल-टाइम हाई पर है और फरवरी 2026 तक इसमें 11.86% का सालाना ग्रोथ दिखा है। हालांकि, वैल्यूएशन (valuation) थोड़ा ज़्यादा लग रहा है, जिसका मतलब है कि अब शायद उतनी तेज़ ग्रोथ की उम्मीद कम हो। भारत की GDP ग्रोथ 25-26 फाइनेंशियल ईयर में 6.4-6.6% रहने का अनुमान है, जो डोमेस्टिक डिमांड से प्रेरित है। दूसरी ओर, 10-साल के सरकारी बॉन्ड यील्ड (bond yield) लगभग 6.7143% है, जो बताता है कि महंगाई के दौर में डेट से मिलने वाला रिटर्न शायद ज़्यादा आकर्षक न हो। ऐसे में, 75% इक्विटी का सुझाव महंगाई और लंबी उम्र के रिस्क से निपटने के लिए ग्रोथ को पकड़ने का एक तरीका है। लेकिन यह तरीका उन लोगों के लिए है जो मार्केट की उठापटक (volatility) झेल सकते हैं।
ज़्यादा इक्विटी के जोखिम
'ScientificPay' का ढांचा भले ही आकर्षक लगे, पर रिटायरमेंट के बाद 75% इक्विटी में निवेश करना कई जोखिमों से भरा है। मार्केट में बड़ी गिरावट आने पर पोर्टफोलियो काफी घट सकता है, जिससे आय का जरिया खतरे में पड़ सकता है। कई भारतीय रिटायरमेंट के बाद स्थिर आय और पूंजी सुरक्षा (capital preservation) के लिए FD और डेट जैसे सुरक्षित विकल्प चुनते हैं, क्योंकि वे मार्केट की उठापटक से बचना चाहते हैं। ऐसे में, अगर शुरुआत में ही मार्केट बहुत गिर गया, तो भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है। साथ ही, स्ट्रेस टेस्ट में दिखाई गई इक्विटी ग्रोथ की गारंटी नहीं होती। इसलिए, कम जोखिम लेने वाले और निश्चित आय चाहने वाले लोगों के लिए कम इक्विटी वाला पोर्टफोलियो ज़्यादा बेहतर हो सकता है। इसीलिए ज़्यादातर इंडस्ट्री एक्सपर्ट रिटायरमेंट के बाद (55 साल की उम्र के बाद) इक्विटी एक्सपोजर (equity exposure) को कम करके डेट की तरफ ज़्यादा झुकाव रखने की सलाह देते हैं।
भविष्य की राह
OmniScience की यह रिपोर्ट भारत में रिटायरमेंट की सुरक्षा को लेकर एक पुरानी सोच को चुनौती देती है - कि सिर्फ बड़ा Corpus होने से सब ठीक है। यह बताती है कि असली सुरक्षा पोर्टफोलियो की 'स्ट्रक्चरल रेज़िलिएंस' (structural resilience) में है, जो महंगाई, लंबी उम्र और मार्केट की उठापटक को झेल सके। 'ScientificPay' मॉडल एक बड़ा कदम है, जो रूढ़िवादी सोच से हटकर लंबे समय की वित्तीय स्वतंत्रता के लिए इक्विटी को ज़रूरी बताता है। जैसे-जैसे भारत की आबादी की उम्र बढ़ रही है और पेंशन कवर कम हो रहा है, हमें अपनी रिटायरमेंट स्ट्रेटेजी पर दोबारा गौर करना होगा। निवेशकों को ऐसे पोर्टफोलियो बनाने होंगे जो ग्रोथ और पूंजी सुरक्षा के बीच सही संतुलन बनाएं, ताकि उनकी बचत उतनी ही लंबी चले जितना उनका जीवन।