India's Financial Inclusion: बैंक खाते तो खुले, पर दिमाग को नहीं मिली 'वित्तीय अक्ल'!

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AuthorAditya Rao|Published at:
India's Financial Inclusion: बैंक खाते तो खुले, पर दिमाग को नहीं मिली 'वित्तीय अक्ल'!
Overview

India के वित्तीय समावेशन (Financial Inclusion) के क्षेत्र में एक चौंकाने वाली रिपोर्ट सामने आई है। IIM उदयपुर और PRICE की एक स्टडी के मुताबिक, जहाँ देश में बैंक खातों की पहुँच तो बढ़ी है, वहीं गुजरात और राजस्थान जैसे राज्यों के लोग अभी भी वित्तीय प्लानिंग, इन्वेस्टमेंट और रिटायरमेंट जैसी ज़रूरी बातों में पिछड़ रहे हैं। इससे भविष्य में वित्तीय जोखिम का खतरा बढ़ गया है।

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खातों की बाढ़, समझ की सूखा!

भारत सरकार के वित्तीय समावेशन (Financial Inclusion) के प्रयासों ने लाखों लोगों को औपचारिक बैंकिंग प्रणाली से जोड़ा है, लेकिन हालिया एक स्टडी ने एक बड़ी सच्चाई को उजागर किया है: बड़ी आबादी अभी भी ज़रूरी वित्तीय ज्ञान से कोसों दूर है। IIM उदयपुर के JM Financial Centre for Financial Research और PRICE द्वारा किए गए पहले 'Financial Maturity Index' (FMI) में गुजरात और राजस्थान के 4,075 घरों का विश्लेषण किया गया। स्टडी में पाया गया कि भले ही लोगों के पास बैंक खाते हों, लेकिन वे अपनी संपत्ति बढ़ाने या भविष्य सुरक्षित करने के लिए वित्तीय प्रणाली का इस्तेमाल करने में संघर्ष कर रहे हैं। यह गैप भारत की आर्थिक प्रगति के लिए एक चुनौती है।

सेविंग तो करते हैं, पर 'समझदारी' से नहीं

सर्वे में शामिल ज़्यादातर लोग नियमित रूप से बचत करते हैं, लेकिन उनमें से एक चौथाई से भी कम लोग अपनी आय का कोई हिस्सा निवेश करते हैं। यह दिखाता है कि केवल बचत करने और पैसे को समझदारी से बढ़ाने के बीच एक बड़ा अंतर है। देश भर में, घर की वित्तीय बचत कई दशकों के निचले स्तर पर आ गई है, भले ही शेयर और म्यूचुअल फंड में निवेश बढ़ा हो। इससे लगता है कि बचत को बढ़ाने के बजाय निष्क्रिय रखा जा रहा है या फिर बढ़ते घर के कर्ज से इसे खपत पर खर्च किया जा रहा है।

प्लानिंग और ज्ञान का भारी घाटा

वित्तीय प्लानिंग, जोखिम प्रबंधन (Risk Management) और लैंगिक समानता (Gender Equality) जैसे पैमानों पर स्कोर बहुत कम रहे, जिससे गुजरात (33.6) और राजस्थान (32.0) का समग्र FMI राष्ट्रीय स्तर पर निचले तीसरे हिस्से में रहा। बेसिक वित्तीय साक्षरता (Financial Literacy) और बचत की आदतें ठीक-ठाक थीं, लेकिन कंपाउंडिंग (Compounding) और महंगाई (Inflation) जैसे अहम कॉन्सेप्ट को समझने में बड़ी कमज़ोरी दिखी, जिसमें केवल 35-38% लोग ही कंपाउंडिंग को समझ पाए। जटिल वित्तीय विषयों की समझ और भी कम थी; केवल 12-17% लोग ही म्यूचुअल फंड या शेयर को सही ढंग से परिभाषित कर पाए। यह ज्ञान का अंतर एक राष्ट्रीय समस्या है, क्योंकि भारत में वयस्कों की वित्तीय साक्षरता का अनुमान केवल 27% है, जो विकसित देशों की तुलना में काफी कम है। कुछ क्षेत्रों में साक्षरता बेहतर है, लेकिन ग्रामीण और शहरी इलाकों में डिजिटल वित्तीय कौशल (Digital Financial Skills) में अक्सर अंतर देखा जाता है।

परिवार की ज़रूरतों के बीच रिटायरमेंट सुरक्षा पर सवाल

रिटायरमेंट का भविष्य विशेष रूप से चिंताजनक है। सर्वे में शामिल आधे से ज़्यादा लोगों ने रिटायरमेंट के लिए योजना बनाना शुरू ही नहीं किया है, और लगभग 75% लोग नेशनल पेंशन सिस्टम (NPS) जैसे सरकारी बचत योजनाओं के बारे में जानते ही नहीं हैं। बच्चों की शिक्षा, स्वास्थ्य और घर जैसी पारिवारिक ज़रूरतें हमेशा रिटायरमेंट प्लानिंग से पहले आती हैं, जिससे यह एक लक्ष्य के बजाय बाद की बात बनकर रह जाती है। दूरदर्शिता की इस कमी का मतलब है कि कई लोग काम के बाद के जीवन के लिए तैयार नहीं हैं, जिससे सामाजिक सहारे पर निर्भरता बढ़ सकती है और उनकी वित्तीय स्वतंत्रता सीमित हो सकती है।

डिजिटल टूल्स का कम इस्तेमाल, भरोसे की कमी

डिजिटल पेमेंट सिस्टम (Digital Payment Systems) व्यापक रूप से उपलब्ध हैं, लेकिन इनका उपयोग लगातार नहीं हो रहा है। केवल 22.3% लोग ही UPI का रोज़ाना इस्तेमाल करते हैं, जबकि 55% कभी इसका इस्तेमाल नहीं करते। बजटिंग ऐप्स (Budgeting Apps) का इस्तेमाल केवल 3.2% लोग ही कर रहे हैं। और चिंता की बात यह है कि केवल 36% लोग ही डिजिटल पेमेंट विवादों को सुलझाने में आत्मविश्वास महसूस करते हैं, भले ही बड़ी संख्या में लोग डिजिटल तरीके से कर्ज ले रहे हों। भरोसे की यह कमी, RBI और NPCI द्वारा नए विवाद समाधान सिस्टम के साथ विश्वास बनाने के प्रयासों के बावजूद, डिजिटल उपयोग को बाधित करती है और जोखिम पैदा करती है।

लचीलेपन की कमी से सिस्टम को खतरा

कम वित्तीय परिपक्वता (Financial Maturity) न केवल व्यक्तिगत संपत्ति को प्रभावित करती है, बल्कि समग्र आर्थिक लचीलेपन (Economic Resilience) को भी कमजोर करती है। अच्छी वित्तीय योजना या आपातकालीन निधि (Emergency Fund) के बिना, घर-परिवार आर्थिक झटकों, महंगाई और अप्रत्याशित खर्चों के प्रति अधिक संवेदनशील होते हैं। इससे वे अधिक कर्ज लेने और महंगे तरीकों से निपटने के लिए प्रवृत्त होते हैं। भले ही PMJDY ने लाखों लोगों को बैंकिंग में शामिल किया हो, लेकिन इसका वास्तविक वित्तीय लचीलेपन या सक्रिय वित्तीय सेवाओं के उपयोग पर बहुत कम प्रभाव पड़ा है। यह गैप एक बड़ा आर्थिक जोखिम पैदा करता है, जो भारत के निरंतर, समावेशी विकास के लक्ष्य को धीमा कर सकता है।

राज्यों और वित्तीय क्षेत्र के सामने चुनौतियाँ

गुजरात और राजस्थान जैसे राज्य, जहाँ वित्तीय परिपक्वता कम है, पूंजी और निवेश वृद्धि में मजबूत वित्तीय कौशल वाले क्षेत्रों से पीछे रह सकते हैं। समझ की यह कमी जटिल वित्तीय उत्पादों की मांग को भी सीमित करती है, जिससे वित्तीय क्षेत्र में नवाचार (Innovation) में बाधा आ सकती है। राष्ट्रीय बचत में गिरावट और घर के कर्ज में वृद्धि के साथ, उपभोक्ताओं को जोखिम भरे उधार से दूर और स्थायी निवेश की ओर निर्देशित करने के लिए बेहतर वित्तीय शिक्षा महत्वपूर्ण है।

आगे का रास्ता: शिक्षा ही कुंजी है

Saurabh Garg, Mospi सचिव जैसे विशेषज्ञ भी मानते हैं कि रिटायरमेंट, लचीलापन और जिम्मेदार बाजार भागीदारी के लिए वित्तीय कौशल में सुधार महत्वपूर्ण है। यह स्टडी वित्तीय सेवाओं की पहुँच बढ़ाने के बजाय मजबूत वित्तीय शिक्षा प्रदान करने पर ध्यान केंद्रित करने की महत्वपूर्ण आवश्यकता पर प्रकाश डालती है। कार्यक्रमों को लोगों को कंपाउंडिंग को समझने, भविष्य की योजना बनाने, जोखिमों का प्रबंधन करने और जटिल डिजिटल वित्तीय प्रणाली का आत्मविश्वास से उपयोग करने का ज्ञान देना चाहिए। इस विकास के बिना, भारत के वित्तीय समावेशन के लक्ष्य पूरी तरह से प्राप्त नहीं हो पाएंगे।

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