ट्रेन यात्रियों के लिए उपलब्ध वैकल्पिक ट्रैवल इंश्योरेंस का प्रीमियम सिर्फ **45 पैसे** है, न कि **1 रुपया**। यह एक ग्रुप एक्सीडेंट पॉलिसी है, न कि कोई व्यापक हेल्थ इंश्योरेंस, जिसे समझना आपके लिए बेहद जरूरी है ताकि इमरजेंसी में क्लेम रिजेक्ट न हो।
अक्सर ट्रेन टिकट बुक करते समय हम 'ट्रैवल इंश्योरेंस' का विकल्प चुनते हैं, जिसे कई लोग बोलचाल में 1 रुपये वाली इंश्योरेंस कहते हैं। हकीकत में इसका प्रीमियम सिर्फ 45 पैसे प्रति यात्री है। लेकिन, इसे लेकर यात्रियों में काफी भ्रम है कि आखिर यह कवर क्या करती है। यह समझना जरूरी है कि यह सिर्फ यात्रा के दौरान होने वाली दुर्घटनाओं के लिए एक ग्रुप इंश्योरेंस है, न कि कोई फुल-फ्लेज्ड हेल्थ कवर।
कवरेज की सीमाएं क्या हैं?
यह पॉलिसी केवल ट्रेन एक्सीडेंट या 'रेलवे एक्ट 1989' के तहत आने वाली घटनाओं जैसे ट्रेन टक्कर, पटरी से उतरना, आतंकी हमला, डकैती या आगजनी पर ही लागू होती है। इसका कवरेज काफी सीमित है: दुर्घटना में मृत्यु या स्थायी विकलांगता पर ₹10 लाख तक, आंशिक विकलांगता पर ₹7.5 लाख तक और अस्पताल के खर्च के लिए ₹2 लाख तक का कवर मिलता है। ध्यान रहे, सामान्य बीमारी या अन्य मेडिकल इमरजेंसी जो रेल हादसे से जुड़ी न हो, उस पर यह कवर काम नहीं करेगा।
क्लेम का 'दस्तावेजी' जाल
यात्री अक्सर गलतफहमी में रहते हैं कि क्लेम की जिम्मेदारी IRCTC की है, जबकि सच यह है कि IRCTC केवल एक फैसिलिटेटर (facilitator) है। बीमा का कॉन्ट्रैक्ट सीधे बीमा कंपनी और यात्री के बीच होता है। क्लेम पाने के लिए रेलवे की एक्सीडेंट रिपोर्ट, अस्पताल के डिस्चार्ज पेपर और बिल जैसे दस्तावेज जमा करने होते हैं। सबसे बड़ी गलती नॉमिनी (Nominee) रजिस्टर न करना है। बीमा कंपनी की वेबसाइट पर नॉमिनी की जानकारी न होने से क्लेम प्रोसेस में कानूनी और प्रशासनिक देरी हो सकती है।
नियमों की हकीकत
फिलहाल यह सुविधा मुख्य रूप से केवल ई-टिकट (e-ticket) बुक करने वालों को ही मिलती है, जिससे काउंटर से टिकट लेने वाले यात्री इससे वंचित रह जाते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने भी इस असमानता पर सवाल उठाए हैं। यात्रियों को इसे एक बेसिक सुरक्षा कवच के रूप में देखना चाहिए, न कि अपनी पूरी हेल्थ पॉलिसी के विकल्प के तौर पर। यात्रा से पहले नॉमिनी जरूर रजिस्टर करें, क्योंकि यही क्लेम के समय सबसे महत्वपूर्ण कड़ी साबित होता है।
