अमेरिकी निवेश की पैसिव ग्रोथ
यह हैरानी की बात है कि भारतीय निवेशकों का 22-25% पोर्टफोलियो अब US इक्विटी में है। यह बढ़त ज्यादातर पैसिव (Passive) रही है, यानी बाज़ार के प्रदर्शन के कारण खुद-ब-खुद बढ़ी है, न कि सोच-समझकर पैसा लगाने से। हालाँकि, S&P 500 और Nasdaq 100 जैसे अमेरिकी इंडेक्स ने रिकॉर्ड तोड़ उछाल दर्ज की है, लेकिन अब यह बढ़ी हुई वैल्यूएशन ही जोखिम का संकेत दे रही है।
वैल्यूएशन चढ़ा आसमान पर, करेंसी गेन में ठहराव
आज अमेरिकी बाज़ार, जैसे S&P 500, की वैल्यूएशन बहुत ज्यादा हो गई है। S&P 500 का P/E रेश्यो (Price-to-Earnings Ratio) करीब 30.24 है, जो इसके ऐतिहासिक औसत 19.4 से काफी ऊपर है। वहीं, CAPE रेश्यो (Cyclically Adjusted Price-to-Earnings) 40.44 पर है, जो भविष्य में कम रिटर्न का संकेत देता है। Nasdaq 100 का P/E भी लगभग 37.62 है, जो इसके 13 साल के औसत से ज्यादा है। इतनी ऊंची वैल्यूएशन पर बाज़ार गिरने का खतरा बढ़ जाता है। इसके अलावा, भारतीय रुपये में जो गिरावट आ रही थी, उससे मिलने वाला फायदा भी अब कम हो रहा है। डॉलर के ₹92.8 के आसपास स्थिर होने से, करेंसी गेन (Currency Gain) से मिलने वाला अतिरिक्त रिटर्न अब उतनी तेज़ी से नहीं बढ़ेगा।
भारत की तुलना में कम रिटर्न का जोखिम?
US इक्विटी का रिस्क प्रीमियम (Equity Risk Premium) सिर्फ 5.28% है, जो बताता है कि यहाँ इक्विटी में पैसा लगाने के जोखिम के मुकाबले मिलने वाला रिटर्न कम है। वहीं, भारत जैसे देशों में निवेश के ज़्यादा आकर्षक विकल्प हो सकते हैं। कई निवेशक केवल इसलिए US स्टॉक्स को होल्ड कर रहे हैं क्योंकि उन्होंने अच्छा प्रदर्शन किया है। इससे अनजाने में ओवरएक्सपोजर (Overexposure) हो सकता है, खासकर अगर आपका पैसा बड़ी US टेक कंपनियों में लगा है।
एक्सपर्ट्स की सलाह: रीबैलेंस करें पोर्टफोलियो
अब एक्सपर्ट्स की सलाह है कि पैसिव होल्डिंग से हटकर स्ट्रेटेजिक रीबैलेंसिंग (Strategic Rebalancing) की ओर बढ़ना चाहिए। अगर आपका US इक्विटी में निवेश 20% से ज़्यादा है, तो आपको इसकी समीक्षा करनी चाहिए। इसका मकसद बाज़ार को टाइम करना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि आपका वर्तमान निवेश आपके लॉन्ग-टर्म फाइनेंशियल गोल्स (Long-term Financial Goals) के अनुसार हो।
