विदेशी बाजारों में निवेश करना अब आसान तो है, लेकिन RBI की LRS लिमिट, **20%** TCS और टैक्स फाइलिंग के नियमों को समझना बेहद जरूरी है। आइए जानते हैं क्या हैं इसके नियम।
बहुत से भारतीय निवेशक अपने पोर्टफोलियो को डायवर्सिफाई करने के लिए ग्लोबल मार्केट की ओर रुख कर रहे हैं। हालांकि अमेरिकी कंपनियों में निवेश करना ग्लोबल ब्रांड्स का हिस्सा बनने का एक शानदार जरिया है, लेकिन इसकी प्रक्रिया, लागत और टैक्स नियम घरेलू निवेश से काफी अलग हैं।
विदेशी निवेश के तरीके
रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) की 'लिबरलाइज्ड रेमिटेंस स्कीम' (LRS) के तहत, भारतीय निवासी हर फाइनेंशियल ईयर में निवेश के लिए $2,50,000 तक विदेश भेज सकते हैं। अधिकांश निवेशक अब फिनटेक प्लेटफॉर्म्स का उपयोग करते हैं, जो सीधे अमेरिकी ब्रोकरेज फर्मों से जुड़े होते हैं। ये फर्में SEC और FINRA के नियमों के तहत काम करती हैं।
लागत और TCS को समझें
विदेश पैसा भेजने पर दो मुख्य खर्च होते हैं: फॉरेन एक्सचेंज मार्कअप और टैक्स। प्लेटफॉर्म्स करेंसी बदलने के लिए 0.5% से 2% तक का मार्कअप चार्ज करते हैं। इसके अलावा, अगर आप एक साल में ₹10 लाख से ज्यादा की रकम LRS के जरिए भेजते हैं, तो उस पर 20% TCS काटा जाता है। यह कोई अतिरिक्त टैक्स नहीं है, इसे आप इनकम टैक्स फाइल करते समय क्लेम कर सकते हैं या रिफंड ले सकते हैं।
टैक्स और रिपोर्टिंग
अमेरिकी शेयरों से मिलने वाले डिविडेंड पर आमतौर पर 25% का विदहोल्डिंग टैक्स लगता है, जिसके लिए निवेशकों को W-8BEN फॉर्म भरना होता है। इस टैक्स को आप भारत में 'फॉरेन टैक्स क्रेडिट' (FTC) के जरिए फॉर्म 67 भरकर एडजस्ट कर सकते हैं। विदेशी शेयरों पर लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन्स का फायदा लेने के लिए उन्हें 24 महीने तक होल्ड करना जरूरी है, जिस पर 12.5% टैक्स लगता है। सबसे महत्वपूर्ण है अपनी एनुअल रिटर्न में 'Schedule FA' फाइल करना, जिसमें आपको अपनी सभी विदेशी संपत्तियों का खुलासा करना होता है।
रिस्क और ध्यान रखने योग्य बातें
याद रखें कि SIPC कवरेज केवल ब्रोकर की विफलता के खिलाफ $5,00,000 तक सुरक्षा देती है, न कि बाजार के नुकसान के खिलाफ। निवेश शुरू करने से पहले फीस स्ट्रक्चर की जांच करें और टैक्स फाइलिंग के लिए एक व्यवस्थित सिस्टम रखें, क्योंकि विदेशी संपत्तियों की जानकारी छिपाना आपको कानूनी मुश्किलों में डाल सकता है।
