वेल्थ ट्रांसफर का नया तरीका: भारत में शेयर और फंड्स गिफ्ट करने का चलन बढ़ा, लेकिन टैक्स का रिस्क बरकरार!

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AuthorAditya Rao|Published at:
वेल्थ ट्रांसफर का नया तरीका: भारत में शेयर और फंड्स गिफ्ट करने का चलन बढ़ा, लेकिन टैक्स का रिस्क बरकरार!
Overview

भारत में धन हस्तांतरण (Wealth Transfer) का एक बड़ा तरीका बन रहा है स्टॉक्स (Stocks) और म्यूचुअल फंड (Mutual Funds) जैसे फाइनेंशियल एसेट्स (Financial Assets) को गिफ्ट करना। जनसांख्यिकीय बदलाव (Demographic Shifts) और टैक्स प्लानिंग (Tax Planning) इसके पीछे की मुख्य वजहें हैं। खास रिश्तेदारों से मिले गिफ्ट टैक्स फ्री हैं, लेकिन **₹50,000** से ऊपर के नॉन-रिलेटिव गिफ्ट्स पर रेसिपिएंट (Recipient) को अपनी टैक्स स्लैब के हिसाब से टैक्स देना पड़ सकता है। सबसे खास बात यह है कि कैपिटल गेन्स टैक्स (Capital Gains Tax) डोनर (Donor) की ओरिजिनल कॉस्ट (Original Cost) और होल्डिंग पीरियड (Holding Period) पर ही तय होगा।

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भारत में पीढ़ी दर पीढ़ी संपत्ति हस्तांतरण (Wealth Transfer) के लिए स्टॉक्स (Stocks) और म्यूचुअल फंड (Mutual Funds) यूनिट्स जैसे फाइनेंशियल एसेट्स को गिफ्ट करने का चलन तेजी से बढ़ रहा है। इसकी एक बड़ी वजह फाइनेंशियल प्रोडक्ट्स में बढ़ती हाउसहोल्ड सेविंग्स (Household Savings) और जनसांख्यिकीय बदलाव (Demographic Shift) है, जिसके तहत संपत्ति युवा पीढ़ी की ओर जा रही है। ये युवा पीढ़ी डिजिटल टूल्स (Digital Tools) के इस्तेमाल में ज्यादा सहज है। भारत का कुल गिफ्टिंग मार्केट (Gifting Market) काफी बड़ा है, जिसका अनुमान 2024 में 75.16 बिलियन USD था और 2030 तक यह 92.32 बिलियन USD तक पहुंचने की उम्मीद है। ऐसे में, फाइनेंशियल एसेट्स की गिफ्टिंग जीवनकाल में संपत्ति बांटने का एक प्रभावी तरीका साबित हो रही है।

गिफ्टिंग के नियम और टैक्स का गणित

शेयरों या म्यूचुअल फंड्स के ट्रांसफर के लिए डोनर (Donor) और रेसिपिएंट (Recipient) दोनों के पास KYC-कंप्लायंट (KYC-Compliant) डीमैट (Demat) या फोलियो अकाउंट (Folio Account) होना जरूरी है। यह ट्रांसफर ब्रोकरेज प्लेटफॉर्म्स (Brokerage Platforms) या सीधे एसेट मैनेजमेंट कंपनियों (AMCs) और रजिस्ट्रार्स (Registrars) के जरिए होता है, जिसके लिए CDSL या NSDL जैसी डिपॉजिटरीज (Depositories) से TPIN या OTP के जरिए ऑथराइजेशन (Authorization) की जरूरत होती है। ज़्यादा वैल्यू के ट्रांसफर के लिए एक गिफ्ट डीड (Gift Deed) बनाने की सलाह दी जाती है, ताकि ट्रांसफर का रिकॉर्ड रहे और टैक्स संबंधी दिक्कतें न आएं। आम तौर पर, गिफ्टिंग को टैक्सेबल ट्रांसफर (Taxable Transfer) नहीं माना जाता, इसलिए डोनर को कैपिटल गेन्स टैक्स (Capital Gains Tax) नहीं देना पड़ता। हालांकि, रेसिपिएंट के लिए टैक्स का गणित थोड़ा पेचीदा है। कुछ खास रिश्तेदारों से मिले गिफ्ट पर इनकम टैक्स (Income Tax) नहीं लगता। लेकिन, एक फाइनेंशियल ईयर (Financial Year) में नॉन-रिलेटिव्स (Non-relatives) से ₹50,000 से ज्यादा के कुल गिफ्ट्स पर रेसिपिएंट को अपनी इनकम टैक्स स्लैब (Income Tax Slab) के हिसाब से 'अन्य स्रोतों से आय' (Income from Other Sources) के तहत टैक्स चुकाना होगा।

रेसिपिएंट द्वारा गिफ्ट की गई संपत्ति को बेचने पर सबसे बड़ा टैक्स असर पड़ता है। कैपिटल गेन्स की गणना के लिए, खरीद की कॉस्ट (Cost of Acquisition) रेसिपिएंट की खरीद कीमत नहीं (जो गिफ्ट के लिए शून्य होती है), बल्कि डोनर की ओरिजिनल खरीद कीमत मानी जाती है। इसी तरह, होल्डिंग पीरियड (Holding Period) भी डोनर से ट्रांसफर हो जाता है। अगर डोनर की ओरिजिनल कॉस्ट पता नहीं है, तो कुछ खास तारीखों - 1 अप्रैल, 2001 या 31 जनवरी, 2018 (1 फरवरी, 2018 से पहले खरीदे गए कुछ लिस्टेड इक्विटी और इक्विटी फंड्स के लिए) - पर फेयर मार्केट वैल्यू (FMV) का इस्तेमाल किया जा सकता है। पुराने रिकॉर्ड्स पर यह निर्भरता एक बड़ा जोखिम खड़ा करती है।

अन्य तरीके और मुख्य जोखिम

संपत्ति हस्तांतरण के लिए फैमिली ट्रस्ट्स (Family Trusts) और हिंदू अविभाजित परिवार (HUFs) जैसे अन्य तरीके भी हैं। भारत में अभी कोई एस्टेट या इनहेरिटेंस टैक्स (Estate or Inheritance Tax) नहीं है, जो ट्रांसफर की स्ट्रेटेजी को प्रभावित करता है। ट्रांसफर के बाद कैपिटल गेन्स टैक्स और स्टैंप ड्यूटी (Stamp Duty) मुख्य चिंताएं हैं। फैमिली ट्रस्ट्स संपत्ति को सुरक्षित रखने और टैक्स-एफिशिएंट (Tax-Efficient) ट्रांसफर के लिए तेजी से इस्तेमाल हो रहे हैं। ये प्राइवेसी (Privacy) देते हैं, वसीयत (Will) के प्रोबेट प्रोसेस (Probate Process) से बचाते हैं और एसेट्स को लेनदारों (Creditors) से बचा सकते हैं। HUFs भी एसेट्स के लिए एक अलग लीगल एंटिटी (Legal Entity) बनाकर टैक्स बचाने का एक तरीका प्रदान करते हैं। हालांकि, ₹50,000 की सीमा के ऊपर नॉन-रिलेटिव्स से मिले गिफ्ट पर टैक्स का असर होता है।

फाइनेंशियल एसेट्स को गिफ्ट करने में कई जोखिम जुड़े हैं। सबसे बड़ा जोखिम डोनर की ओरिजिनल कॉस्ट और होल्डिंग पीरियड का सही पता लगाना है। यदि ओरिजिनल कॉस्ट ज्ञात नहीं है, तो FMV का उपयोग रेसिपिएंट के लिए अपेक्षित से अधिक कॉस्ट बेस (Cost Basis) दे सकता है, जो भविष्य के कैपिटल गेन्स की गणना को प्रभावित करेगा। इसके अलावा, दोनों पक्षों पर सटीक रिकॉर्ड रखने की जिम्मेदारी होती है, और इसमें विफलता भारी टैक्स पेनल्टी (Tax Penalties) का कारण बन सकती है। ट्रस्ट जैसे स्ट्रक्चर्ड ऑप्शन्स (Structured Options) के विपरीत, जो एसेट मैनेजमेंट के लिए स्पष्ट लीगल फ्रेमवर्क (Legal Framework) प्रदान करते हैं, गिफ्टिंग एक अधिक ट्रांजेक्शनल (Transactional) तरीका है और भविष्य में टैक्स जांच या विवादों के खिलाफ कम मजबूत है। चूंकि भारत में कोई एस्टेट ड्यूटी नहीं है, इसलिए ट्रांसफर के बाद कैपिटल गेन्स टैक्स ही मुख्य चिंता है। भारी भविष्य की टैक्स देनदारियों से बचने के लिए सावधानीपूर्वक रिकॉर्ड-कीपिंग (Record-keeping) बेहद महत्वपूर्ण है।

भविष्य की राह: गिफ्टिंग को सरल बनाने की कोशिशें

रेगुलेटर्स (Regulators) फाइनेंशियल एसेट गिफ्टिंग के पहलुओं को औपचारिक (Formalize) और सरल बनाने की दिशा में काम कर रहे हैं। भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (SEBI) ने म्यूचुअल फंड्स के लिए 'गिफ्ट प्रीपेड पेमेंट इंस्ट्रूमेंट्स' (Gift PPIs) का प्रस्ताव दिया है। इन 'गिफ्ट कार्ड्स' की सीमा ₹10,000 प्रति इंस्ट्रूमेंट और प्रति निवेशक सालाना ₹50,000 तक होगी, जिसका मकसद नए निवेशकों को आकर्षित करना और वित्तीय समावेशन (Financial Inclusion) को बढ़ावा देना है। हालांकि यह पहल गिफ्टिंग में संरचना और नियंत्रण लाने का इरादा रखती है, लेकिन गिफ्ट की गई संपत्ति पर कैपिटल गेन्स की गणना के जटिल नियम अभी भी लागू होंगे। जैसे-जैसे वेल्थ मैनेजमेंट (Wealth Management) अधिक संरचित हो रहा है और इंटीग्रेटेड एडवाइजरी प्लेटफॉर्म्स (Integrated Advisory Platforms) की ओर बढ़ रहा है, गिफ्टिंग एक व्यापक, जटिल और डेटा-संचालित वित्तीय योजना प्रणाली का हिस्सा बने रहने की संभावना है।

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