भारतीय इनकम टैक्स विभाग ने विदेशी एम्प्लॉई स्टॉक ऑप्शंस (ESOPs) बेचने वाले प्रोफेशनल्स के लिए टैक्स नियमों को कड़ा कर दिया है। अब इन ESOPs की बिक्री से होने वाले मुनाफे पर कैपिटल गेन्स टैक्स (Capital Gains Tax) के सख्त प्रावधान लागू होंगे, जिससे कई तरह की मुश्किलें खड़ी हो गई हैं।
जो लोग विदेशों में काम करते हुए अपनी कंपनियों से ESOPs पाते हैं और भारत लौटने पर उन्हें बेचते हैं, उनके लिए अब टैक्स का भुगतान करना एक टेढ़ी खीर बन गया है।
ESOPs पर टैक्स कैसे लगता है: दो मुख्य चरण
असल में, ESOPs पर टैक्स दो मुख्य चरणों में लगता है। सबसे पहले, जब आप अपने ऑप्शंस को एक्सरसाइज करते हैं, यानी शेयर खरीदते हैं। उस दिन शेयर की फेयर मार्केट वैल्यू (FMV) और आपके द्वारा चुकाई गई कीमत का अंतर आपकी सैलरी इनकम में जोड़ा जाता है और आपके इनकम टैक्स स्लैब के हिसाब से टैक्स लगता है। इस पर TDS (Tax Deducted at Source) भी कटता है।
इसके बाद, जब आप उन शेयर्स को बेचते हैं, तो होने वाले मुनाफे पर कैपिटल गेन्स टैक्स लगता है। ध्यान देने वाली बात यह है कि कैपिटल गेन्स की गणना के लिए शेयर की कीमत एक्सरसाइज के समय की FMV मानी जाती है, न कि वह कीमत जो आपने ऑप्शन खरीदने के लिए चुकाई थी। यह दो बार टैक्स लगने से बचाता है।
होल्डिंग पीरियड के हिसाब से टैक्स की दरें
आपके ESOPs को बेचने पर होने वाले मुनाफे को शॉर्ट-टर्म या लॉन्ग-टर्म कैपिटल गेन में बांटा जाता है, जो इस बात पर निर्भर करता है कि वे अलॉटमेंट (Allotment) की तारीख से कितने समय तक रखे गए। अगर शेयर्स को अलॉटमेंट के 24 महीने या उससे कम समय के लिए रखा गया है, तो उनके मुनाफे पर आपकी सैलरी की तरह ही इनकम टैक्स स्लैब के अनुसार टैक्स लगेगा। वहीं, अगर शेयर्स 24 महीने से ज्यादा समय तक रखे जाते हैं, तो यह लॉन्ग-टर्म कैपिटल गेन (LTCG) माना जाएगा और इस पर 12.50% की फ्लैट दर से टैक्स लगेगा। हालांकि, इन पर इंडेक्सेशन बेनिफिट (Indexation Benefit) का फायदा नहीं मिलता है।
टैक्स छूट: प्रॉपर्टी में निवेश
LTCG टैक्स से बचने का सबसे मुख्य तरीका है कि आप ESOPs की बिक्री से मिले पैसों को किसी भारतीय निवासी प्रॉपर्टी (Residential Property) में निवेश करें। सेक्शन 54F के तहत, अगर आप बिक्री के 2 साल के भीतर प्रॉपर्टी खरीदते हैं या 3 साल के भीतर उसका निर्माण करवाते हैं, तो आप टैक्स छूट का लाभ उठा सकते हैं। यह छूट इस बात पर निर्भर करती है कि आपने कितनी रकम निवेश की है।
अगर आप टैक्स रिटर्न भरने से पहले प्रॉपर्टी नहीं खरीद पाते, तो आपको टैक्स रिटर्न भरने की आखिरी तारीख तक बिक्री की रकम को कैपिटल गेन्स अकाउंट स्कीम (CGAS) में जमा कराना होगा। फिर तय समय सीमा के अंदर उस पैसे से प्रॉपर्टी खरीदनी होगी। बता दें कि 1 अप्रैल 2024 से सेक्शन 54F के तहत अधिकतम टैक्स छूट की सीमा ₹10 करोड़ कर दी गई है।
ग्लोबल वर्कफोर्स के मुद्दे और डबल टैक्सेशन का खतरा
आजकल जब ज्यादा लोग अंतरराष्ट्रीय स्तर पर काम कर रहे हैं, तो ESOPs को लेकर टैक्स की जटिलताएं बढ़ रही हैं। प्रोफेशनल्स जो अलग-अलग देशों में सेवाएं देते हैं, उन्हें यह तय करने में परेशानी होती है कि उनके ESOPs के लाभों पर टैक्स का बंटवारा कैसे होगा। भारतीय टैक्स कानूनों में इस बात को लेकर कोई स्पष्ट नियम नहीं हैं कि किस देश में काम करने के आधार पर ESOPs पर टैक्स का बंटवारा किया जाए।
इस अनिश्चितता से डबल टैक्सेशन (Double Taxation) का खतरा बढ़ जाता है, यानी एक ही मुनाफे पर भारत और किसी दूसरे देश में टैक्स लग सकता है, भले ही देशों के बीच टैक्स संधि (DTAA) हो। कई बार अदालती फैसलों ने भारतीय सेवा अवधि के आधार पर टैक्स बंटवारे का समर्थन किया है, लेकिन सरकार की ओर से स्पष्ट दिशानिर्देशों का इंतजार है। बजट 2026 के लिए कुछ सुधारों का सुझाव दिया गया है ताकि यह वैश्विक तरीकों, जैसे OECD के 'वर्क डे' दृष्टिकोण, से मेल खा सके।
नकदी का संकट और सीमित विकल्प
ESOPs पर लगने वाले टैक्स से प्रोफेशनल्स को नकदी के संकट (Cash Flow Strain) का सामना करना पड़ सकता है। ऑप्शन एक्सरसाइज करते समय ही टैक्स चुकाना पड़ जाता है, भले ही शेयर लिस्टेड न हों या आसानी से बेचे न जा सकें। इसका मतलब है कि कर्मचारियों को 'पेपर प्रॉफिट' पर भी टैक्स देना पड़ सकता है, जबकि उनके हाथ में नकदी नहीं होती।
कुछ विदेशी योजनाओं के विपरीत, जो टैक्स को टालने (Deferral) की सुविधा देती हैं, भारतीय ESOP टैक्स नियम कम लचीले हो सकते हैं। यह उन स्टार्टअप्स के लिए विशेष रूप से सच है जिनके पास विशिष्ट डीफरल विकल्प हो सकते हैं।
इसके अलावा, विदेशी ESOPs को आपकी टैक्स रिटर्न के शेड्यूल FA (Schedule FA) में विदेशी संपत्ति के रूप में घोषित करना अनिवार्य है। ऐसा न करने पर 'ब्लैक मनी एक्ट' (Black Money Act) के तहत जुर्माना लग सकता है। हालांकि, ₹20 लाख से कम मूल्य की कुछ चल संपत्ति की रिपोर्टिंग न करने पर जुर्माने को हटाने के प्रस्ताव भी विचाराधीन हैं।
सेक्शन 54F पर निर्भर रहना, जो मुख्य रूप से प्रॉपर्टी खरीदने से जुड़ा है, उन लोगों के लिए कम लचीलापन प्रदान करता है जो ऐसी खरीदारी की योजना नहीं बना रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर टैक्स बंटवारे के स्पष्ट नियमों की कमी का मतलब है कि काम कहीं भी किया गया हो, मुनाफे का एक बड़ा हिस्सा भारत में ही टैक्स हो सकता है। इससे टैक्स का बोझ बढ़ता है और कानूनी चुनौतियों का खतरा भी।