कानूनी बदलावों से बढ़ी थी चिंता
फिक्स्ड और रिकरिंग डिपॉजिट रखने वाले ग्राहकों को नए इनकम-टैक्स एक्ट, 2025 को लेकर कुछ चिंताएं थीं। उन्हें डर था कि कहीं कानून में बदलाव से उनके ब्याज पर लगने वाले TDS की दरें या लिमिट न बढ़ जाएं। यह चिंता खासतौर पर TDS के सेक्शन 194A (पुराने एक्ट) से नए कानून के सेक्शन 393(1) में शिफ्ट होने और बैंकिंग कंपनी की परिभाषा में बदलाव जैसी बातों को लेकर थी।
TDS की दरें और लिमिट पहले जैसी
लेकिन, इनकम टैक्स विभाग ने साफ कर दिया है कि कानूनी बदलावों का टैक्स के नियमों पर कोई असर नहीं पड़ेगा। बैंकों द्वारा TDS की कटौती मौजूदा 10% की दर से ही होगी, अगर ब्याज तय लिमिट से ज्यादा है। यदि ग्राहक अपना पैन (PAN) नहीं देते हैं, तो TDS की दर 20% ही रहेगी।
क्या है लिमिट और कैसे पाएं छूट?
TDS कटौती के लिए मौजूदा लिमिट ₹50,000 सालाना (सामान्य नागरिकों के लिए) और ₹1 लाख (वरिष्ठ नागरिकों के लिए) है। बचत खाते (Savings Account) के ब्याज पर कोई TDS नहीं कटता है, हालांकि यह ₹10,000 से अधिक होने पर सेक्शन 80TTA के तहत टैक्सेबल होता है। जिन करदाताओं की कुल आय टैक्स योग्य सीमा से कम है, वे अपने बैंकों में फॉर्म 15G (60 वर्ष से कम उम्र वालों के लिए) या फॉर्म 15H (60 वर्ष से अधिक उम्र वालों के लिए) जमा करके TDS से छूट पा सकते हैं।
जमाकर्ताओं को मिली निश्चितता
यह स्पष्टीकरण लाखों बैंक ग्राहकों को बड़ी राहत देता है, जिन्हें अनपेक्षित टैक्स देनदारी बढ़ने का डर सता रहा था। विभाग के इस आश्वासन से साफ है कि विधायी अपडेट्स का टर्म डिपॉजिट पर TDS के व्यावहारिक पहलुओं पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा है।
