ITAT मुंबई ने बढ़ाई कैश गिफ्ट्स के लिए सबूत की मांग
इनकम टैक्स अपीलेट ट्रिब्यूनल (ITAT) मुंबई ने साफ कर दिया है कि अगर कोई व्यक्ति बड़ी रकम कैश गिफ्ट के तौर पर दिखाता है, तो उसे केवल एफिडेविट से कहीं बढ़कर सबूत पेश करने होंगे। एक हालिया फैसले में, ट्रिब्यूनल ने कहा है कि टैक्सपेयर्स को अब यह साबित करना होगा कि गिफ्ट देने वाले (Donor) के पास वाकई इतनी आर्थिक क्षमता थी और वह पैसा कहां से आया था। इस फैसले से अनुपालन के मानक ऊंचे हो गए हैं और अधूरे सबूत वाले गिफ्ट्स को अघोषित आय (Undeclared Income) माने जाने का जोखिम बढ़ गया है।
एक केस स्टडी: डोनर की आर्थिक क्षमता पर सवाल
यह स्थिति तब और स्पष्ट हो गई जब श्रेणिक मनीष मेहता के मामले में ट्रिब्यूनल का रुख सामने आया। श्रेणिक ने अपने पिता, मां और पत्नी से मिले ₹13.95 लाख कैश को गिफ्ट के तौर पर दिखाया था। हालांकि, टैक्स अधिकारियों ने इन दावों को खारिज कर दिया था, क्योंकि उनके अनुसार एफिडेविट पर्याप्त नहीं थे और उन्हें परिवार के सदस्यों की कमाई की क्षमता का प्रमाण देना था। ITAT के फैसले में कुछ गिफ्ट्स को स्वीकार करना, यह दर्शाता है कि पारिवारिक उदारता आम है, लेकिन इसके वित्तीय आधार को सत्यापित किया जाना आवश्यक है।
इस फैसले में भारत के इनकम टैक्स एक्ट (Income Tax Act) की धारा 69A का भी जिक्र है, जो टैक्स अधिकारियों को अस्पष्ट पाए जाने वाले पैसों को असेसी (Assessee) की आय मानने की अनुमति देती है। मेहता के मामले में, उनकी पत्नी द्वारा ₹3 लाख का गिफ्ट उनकी सत्यापित आय और नियमित बैंकिंग लेनदेन से पूरी तरह समर्थित था। लेकिन, उनके माता-पिता से मिले गिफ्ट्स, जिनकी घोषित आय मामूली थी, केवल आंशिक रूप से ही मान्य किए गए। ट्रिब्यूनल ने पिता और मां से मिले गिफ्ट्स का 50% स्वीकार किया, क्योंकि उनके बैंक रिकॉर्ड में फंड देने की कुछ क्षमता दिखाई गई थी, लेकिन दावों की पूरी राशि के लिए नहीं।
आंशिक अस्वीकृति और जुर्माने का जोखिम
इस फैसले से टैक्सपेयर्स के लिए एक बड़ा जोखिम पैदा हो गया है: दावा किए गए गिफ्ट्स के आंशिक रूप से अस्वीकृत होने की संभावना। मेहता के मामले में, कुल ₹15.50 लाख में से ₹4.70 लाख की राशि अंततः अस्पष्ट पाई गई, जिससे उन्हें इनकम टैक्स एक्ट के तहत ब्याज और पेनल्टी (Penalties) लग सकती थी। अब टैक्स अथॉरिटीज से उम्मीद की जाती है कि वे बड़ी नकदी प्राप्तियों पर और अधिक सख्ती से सवाल पूछेंगे, खासकर जहां डोनर की वित्तीय स्थिति और कैश का स्रोत स्पष्ट रूप से दर्ज नहीं है।
एफिडेविट को अब ऐसे मामलों में कमजोर सबूत माना जा रहा है। गिफ्ट देने से पहले डोनर की आर्थिक क्षमता और कैश के स्रोत का मजबूत प्रमाण सर्वोपरि है। इस सबूत को पेश करने में विफलता लंबे कर विवादों (Tax Disputes) और वित्तीय देनदारियों को जन्म दे सकती है, क्योंकि सबूत का भार काफी हद तक असेसी पर होता है। सद्भावना के बावजूद, अपर्याप्त वित्तीय दस्तावेज एक गिफ्ट को टैक्सेबल इनकम में बदल सकते हैं, जिससे समग्र वित्तीय योजना प्रभावित हो सकती है और कंप्लायंस की लागत बढ़ सकती है।
भविष्य के गिफ्ट्स के लिए प्रोएक्टिव डॉक्यूमेंटेशन ज़रूरी
बड़ी नकदी लेनदेन में शामिल व्यक्तियों और परिवारों को, चाहे वह गिफ्ट हो या लोन, डॉक्यूमेंटेशन को लेकर सक्रिय दृष्टिकोण अपनाने की सलाह दी जाती है। इसमें औपचारिक गिफ्ट डीड्स (Gift Deeds) बनाना, सभी पक्षों की आय के स्रोतों का विस्तृत रिकॉर्ड बनाए रखना और यह सुनिश्चित करना शामिल है कि बैंक स्टेटमेंट बड़ी रकम देने की क्षमता को स्पष्ट रूप से दर्शाते हों। ITAT का यह फैसला एक स्पष्ट अनुस्मारक है कि कर नियमों से निपटने के लिए पारदर्शिता और सत्यापन योग्य साक्ष्य आवश्यक हैं, खासकर जब संबंधित पक्षों के बीच बड़ी रकम का हस्तांतरण हो रहा हो।
