मुंबई के एक IT मैनेजर ₹60 लाख के कर्ज में डूब गए हैं। वजह? फ्यूचर्स और ऑप्शन्स (F&O) ट्रेडिंग में हुए भारी नुकसान। उनकी ₹1.6 लाख की सैलरी से ₹1.85 लाख की EMI, इस हाई-लीवरेज ट्रेडिंग के खतरनाक रिस्क को दिखाती है।
कर्ज का मकड़जाल
मुंबई की एक मल्टीनेशनल IT फर्म में मैनेजर के तौर पर काम करने वाले 35 वर्षीय व्यक्ति ने रिटेल ट्रेडिंग के गंभीर खतरों की ओर ध्यान खींचा है। उन्होंने करीब ₹60 लाख का पर्सनल कर्ज होने की बात स्वीकार की है। यह कर्ज फ्यूचर्स और ऑप्शन्स (F&O) ट्रेडिंग में हुए नुकसान से जमा हुआ है, जिससे अब उनकी आर्थिक स्थिति बेहद चिंताजनक हो गई है। उनकी हर महीने की EMI, उनकी ₹1.6 लाख की सैलरी से भी ज्यादा, यानी ₹1.85 लाख हो गई है।
EMI ने बढ़ाई मुश्किलें
यह स्थिति इस बात का जीता-जागता सबूत है कि ओवर-लिवरेज्ड ट्रेडिंग कितनी खतरनाक हो सकती है। जहां उनकी मासिक आय ₹1.6 लाख है, वहीं EMI के रूप में उन्हें हर महीने ₹1.85 लाख देने पड़ रहे हैं। यानी, घर के खर्चे अलग, हर महीने ₹25,000 का घाटा हो रहा है। इस कर्ज में पर्सनल लोन, ₹7 लाख के क्रेडिट कार्ड बिल और नॉन-बैंकिंग फाइनेंशियल कंपनी (NBFCs) व डिजिटल लेंडिंग प्लेटफॉर्म्स के अलग-अलग कर्जे शामिल हैं।
F&O ट्रेडिंग का रिस्क
बहुत से रिटेल निवेशक F&O ट्रेडिंग को जल्दी पैसा कमाने का जरिया मानते हैं। लेकिन, इन इंस्ट्रूमेंट्स में हाई-लीवरेज का मतलब है कि नुकसान आपके लगाए पैसों से कहीं ज्यादा हो सकता है। जब ट्रेडर्स इन नुकसानों की भरपाई के लिए और कर्ज लेते हैं – अक्सर बिना सिक्योरिटी वाले पर्सनल लोन या क्रेडिट कार्ड से – तो ब्याज का बोझ बढ़ता जाता है और स्थिति हाथ से निकल जाती है।
बाज़ार और रेगुलेटर की चेतावनी
हाल के सालों में भारतीय रिटेल निवेशकों के बीच F&O ट्रेडिंग की लोकप्रियता बढ़ी है। हालांकि, रेगुलेटर्स और वित्तीय विशेषज्ञों ने बार-बार चेतावनी दी है कि डेरिवेटिव सेगमेंट में ज्यादातर व्यक्तिगत ट्रेडर्स को नुकसान ही होता है। इसका मुख्य कारण यह है कि लोग इसे कमाई का जरिया समझने लगते हैं, न कि एक हाई-रिस्क एक्टिविटी। इससे इमोशनल फैसले लिए जाते हैं और अंततः ऐसी गंभीर आर्थिक तंगी आती है।
आगे का रास्ता
जब कर्ज आपकी आय से ज्यादा हो जाता है, तो सबसे पहला असर आपके क्रेडिट स्कोर पर पड़ता है, जो भविष्य में लोन मिलना मुश्किल कर सकता है। ऐसे में, कर्जदारों के पास कुछ ही विकल्प बचते हैं: वे लेंडर्स के साथ लंबे रीपेमेंट टेन्योर पर बात कर सकते हैं, डेट काउंसलिंग की मदद ले सकते हैं, या अगर संभव हो तो ऊंची ब्याज वाले कर्ज को कम ब्याज वाले प्रोडक्ट में शिफ्ट करके ब्याज का बोझ कम कर सकते हैं।
पेमेंट में पीछे रहने पर कानूनी कार्रवाई और वसूली की प्रक्रिया भी शुरू हो सकती है। कई लोग गुप्त रूप से कर्ज का बोझ उठाते हैं, जिससे स्थिति और जटिल हो जाती है। रिपोर्ट के मुताबिक, इस व्यक्ति ने फिलहाल सारी ट्रेडिंग एक्टिविटी बंद कर दी है और कर्ज को रीस्ट्रक्चर करने के लिए प्रोफेशनल सलाह ले रहे हैं। यह दिखाता है कि ऐसे संकट से निकलने का पहला कदम नुकसान पहुंचाने वाले व्यवहार को रोकना और अपनी आर्थिक हकीकत को स्वीकार कर एक स्थायी रास्ता खोजना है।
