Rule-based investing यानी नियमों पर आधारित निवेश, इंसानी भावनाओं को पोर्टफोलियो मैनेजमेंट से दूर रखता है। ये प्री-डिफाइंड स्ट्रैटेजी (pre-defined strategy) मार्केट में आने वाले उतार-चढ़ाव के दौरान रीबैलेंसिंग (rebalancing) और कैपिटल डिप्लॉयमेंट (capital deployment) जैसे फैसलों को ऑटोमेट (automate) करती है। इससे निवेशक घबराहट में बिकवाली या हाई पर खरीदने जैसी गलती से बच सकते हैं और लंबी अवधि में बेहतर रिटर्न का लक्ष्य रख सकते हैं।
भावनाओं से परे, सिस्टमैटिक निवेश का कमाल
पर्सनल फाइनेंस (personal finance) को ठीक से मैनेज करने का एक बड़ा हिस्सा मार्केट में आने वाले उतार-चढ़ाव के दौरान अपनी प्रतिक्रियाओं को कंट्रोल करना है। यह तो तय है कि मार्केट में वोलेटिलिटी (volatility) रहेगी ही। लेकिन, जब निवेशक मार्केट गिरने पर अपने सिस्टमैटिक इन्वेस्टमेंट प्लान (SIP) बंद कर देते हैं या रिकॉर्ड हाई पर पहुंचने पर और ज्यादा खरीदारी करते हैं, तो ये एक्शन मार्केट के मूवमेंट्स (movements) से कहीं ज्यादा लंबी अवधि के रिटर्न को नुकसान पहुंचा सकते हैं।
इस समस्या से निपटने के लिए, बहुत से निवेशक रूल-बेस्ड इन्वेस्टिंग (rule-based investing) की ओर रुख कर रहे हैं। यह एक डिसिप्लिन्ड (disciplined) तरीका है जो पोर्टफोलियो से जुड़े फैसलों के लिए स्पष्ट, पहले से तय किए गए ट्रिगर्स (triggers) सेट करके अंदाजेबाजी को खत्म करता है।
इमोशनल फैसले लेना बंद करें
रूल-बेस्ड इन्वेस्टिंग में, मार्केट की कंडीशन बदलने से पहले ही पोर्टफोलियो के बिहेवियर (behaviour) के लिए नियम तय कर दिए जाते हैं। इससे यह सुनिश्चित होता है कि जब मार्केट में बड़ा उतार-चढ़ाव आए, तो फैसला पहले से ही लिया हुआ हो। एक्सपर्ट्स का मानना है कि यह तरीका तब एक्शन लेने पर जोर देता है जब निवेशक शांत हो, न कि तब जब वे अपने पोर्टफोलियो की वैल्यू को लेकर चिंतित हों और जल्दबाजी में फैसले लें। यह अप्रोच (approach) मार्केट के शॉर्ट-टर्म नॉइज़ (noise) की परवाह किए बिना, फाइनेंशियल गोल्स (financial goals) की ओर एक कंसिस्टेंट (consistent) रास्ता बनाए रखने में मदद करती है।
की ऑटोमेटेड इन्वेस्टमेंट स्ट्रैटेजीज (Key Automated Investment Strategies)
निवेशक अपने पोर्टफोलियो को रिस्क टॉलरेंस (risk tolerance) के हिसाब से अलाइन (align) रखने के लिए कई कॉमन रूल-बेस्ड स्ट्रैटेजीज (strategies) का इस्तेमाल कर सकते हैं। एक आम तरीका है फिक्स्ड एसेट एलोकेशन (fixed asset allocation)। इसमें, निवेशक इक्विटी (equity) और डेट (debt) के बीच एक खास स्प्लिट (split) तय करता है, जैसे 60% इक्विटी और 40% डेट। अगर इक्विटी मार्केट में तेजी आती है और इक्विटी का हिस्सा 70% तक पहुंच जाता है, तो यह स्ट्रैटेजी ऑटोमेटिकली (automatically) इक्विटी को बेचने और डेट को खरीदने का ट्रिगर करती है, ताकि पोर्टफोलियो वापस अपने ओरिजिनल 60/40 बैलेंस पर आ जाए। इससे मार्केट को टाइम (time) करने की जरूरत के बिना, स्वाभाविक रूप से हाई पर बेचना और लो पर खरीदना संभव हो जाता है।
एक और तरीका है बबल प्लान (bubble plan) का इस्तेमाल करना, जो मार्केट वैल्यूएशन्स (valuations) के ऐतिहासिक औसत की तुलना में बहुत ज्यादा होने पर इक्विटी एक्सपोजर (exposure) को कम कर देता है। मार्केट के जबरदस्त उत्साह के समय, सेफ और ज्यादा कंजर्वेटिव (conservative) इन्वेस्टमेंट में फंड्स को शिफ्ट करके, निवेशक संभावित करेक्शन (correction) से पहले अपने पोर्टफोलियो के रिस्क को कम कर सकते हैं। इसके विपरीत, क्राइसिस प्लान (crisis plan) बड़ी मार्केट गिरावट को अवसरों के रूप में देखता है। इस सेटअप में, अगर मार्केट एक तय परसेंटेज, जैसे 15%, तक गिरता है, तो यह स्ट्रैटेजी डेट फंड्स से इक्विटी में पैसा ट्रांसफर करने का ट्रिगर करती है, जिससे निवेशक को कम कीमतों का फायदा उठाने का मौका मिलता है।
डिसिप्लिन्ड कैपिटल डिप्लॉयमेंट (Disciplined Capital Deployment)
बड़ी रकम निवेश करने वालों के लिए, रूल-बेस्ड स्ट्रैटेजीज कैपिटल को धीरे-धीरे डिप्लॉय (deploy) करके रिस्क मैनेज करने का एक तरीका भी प्रदान करती हैं। सारा कैपिटल एक साथ निवेश करने के बजाय, एक निवेशक शुरुआती तौर पर कुछ हिस्सा लगा सकता है और बाकी को समय के साथ निवेश करने के लिए नियम तय कर सकता है। अगर मार्केट में गिरावट के कारण वैल्यूएशन्स ज्यादा आकर्षक हो जाते हैं, तो सिस्टम बचे हुए कैपिटल के इन्वेस्टमेंट को तेज कर सकता है। यह डिसिप्लिन्ड स्ट्रक्चर (disciplined structure) यह सुनिश्चित करता है कि फैसले रैशनल (rational) रहें और लॉन्ग-टर्म प्लान (long-term plan) पर केंद्रित हों, जिससे निवेशकों को मुश्किल दौर में भी अपने प्लान के प्रति प्रतिबद्ध रहने में मदद मिलती है।
