जॉइंट ओनरशिप में प्रॉपर्टी बेचने पर टैक्स की उलझनों से बचना चाहते हैं? इनकम टैक्स एक्ट के सेक्शन 54 के तहत छूट पाने के लिए फंड के स्रोत का सही रिकॉर्ड रखना बहुत जरूरी है।
जॉइंट ओनरशिप वाली प्रॉपर्टी बेचना टैक्स के नजरिए से काफी संवेदनशील मामला है। प्रॉपर्टी के कागजों में नाम चाहे किसी के भी हों, इनकम टैक्स डिपार्टमेंट कैपिटल गेन (Capital Gains) का आकलन करते समय असल निवेश और फाइनेंशियल योगदान पर नजर रखता है।\n\n### फंडिंग का सबूत है सबसे जरूरी\n\nअगर आपने पत्नी या परिवार के किसी सदस्य के साथ मिलकर प्रॉपर्टी ली है, तो टैक्स अथॉरिटीज यह देखती हैं कि पैसा किसने दिया। जिस व्यक्ति ने असल में निवेश किया है, उसी की जिम्मेदारी बनती है कि वह गेन दिखाए और सेक्शन 54 के तहत टैक्स छूट का दावा करे। इसके लिए बैंक स्टेटमेंट, लोन रीपेमेंट रिकॉर्ड और फंड ट्रांसफर के पक्के दस्तावेज संभालकर रखना बेहद जरूरी है, ताकि असेसमेंट के दौरान किसी नोटिस का सामना न करना पड़े।\n\n### AIS डेटा में गड़बड़ी को ऐसे संभालें\n\nआजकल प्रॉपर्टी ट्रांजैक्शन की जानकारी सब-रजिस्ट्रार ऑफिस से सीधे आपके एनुअल इंफॉर्मेशन स्टेटमेंट (AIS) में आ जाती है। यदि AIS में आपका नाम दिख रहा है जबकि आपने निवेश नहीं किया था, तो इनकम टैक्स पोर्टल पर 'फीडबैक' मैकेनिज्म का इस्तेमाल करें। इसे सही ओनर या फैमिली मेंबर के नाम मार्क करना जरूरी है, वरना आपको बिना मतलब के टैक्स नोटिस आ सकते हैं।\n\n### सेक्शन 54 के अहम नियम\n\nटैक्स छूट पाने के लिए एसेट को कम से कम 24 महीने तक होल्ड करना जरूरी है। नए घर में निवेश के लिए नियम कड़े हैं: नया घर बिक्री से 1 साल पहले या 2 साल बाद खरीदा जा सकता है, या निर्माण 3 साल के भीतर पूरा होना चाहिए। याद रखें, छूट की अधिकतम सीमा ₹10 करोड़ तय की गई है। अगर आप तय समय सीमा तक पैसा री-इन्वेस्ट नहीं कर पाते, तो उसे कैपिटल गेन्स डिपॉजिट अकाउंट स्कीम में जमा करना होगा, अन्यथा आपको टैक्स देना पड़ सकता है।\n\n### क्या ध्यान रखें?\n\nहमेशा अपनी टैक्स फाइलिंग में 'ओनरशिप परसेंटेज' के बजाय 'एक्चुअल फंडिंग' को प्राथमिकता दें। एक स्पष्ट ऑडिट ट्रेल ही टैक्स विवादों से बचने का एकमात्र ठोस तरीका है।
