एक वर्किंग कपल का हालिया केस स्टडी सामने आया है, जो अपनी मंथली इनकम का **44%** हिस्सा होम लोन की EMI भरने में खर्च कर रहा है। भारी कर्ज के चलते उन्हें अपने परिवार नियोजन (parenthood) जैसे बड़े फैसलों को टालना पड़ रहा है, जो घर खरीदने के 'छिपे हुए' जोखिमों की ओर इशारा करता है।
हालिया पर्सनल फाइनेंस केस स्टडी ने रियल एस्टेट के सपनों और उसके साथ आने वाली चुनौतियों के बीच के कड़वे सच को सामने रखा है। एक प्रोफेशनल कपल, जिनकी मंथली टेक-होम सैलरी लगभग ₹4 लाख है, वे ₹4 करोड़ की प्रॉपर्टी के लिए लोन चुकाने के कारण भारी तनाव में हैं। ₹1.73 लाख की EMI उनकी सैलरी का 44% हिस्सा खा जाती है, जिससे अन्य खर्चों के बाद उनके पास महज ₹42,000 का सरप्लस बचता है। यह सरप्लस भी घर के रिनोवेशन में खर्च हो रहा है, जिससे भविष्य के लिए कोई आपातकालीन फंड नहीं बच रहा है।
'EMI इरोशन' का खेल
इसे फाइनेंस की भाषा में 'EMI इरोशन' कहा जाता है। इसमें आपकी नेट वर्थ कागज पर तो बढ़ती है, लेकिन आपकी फाइनेंशियल फ्लेक्सिबिलिटी पूरी तरह खत्म हो जाती है। मेडिकल इमरजेंसी या नौकरी जाने जैसी स्थिति में इनके पास कोई बफर नहीं है। एक्सपर्ट्स के अनुसार, आपका Debt-to-Income (DTI) रेश्यो कभी भी 30% से 40% से ऊपर नहीं जाना चाहिए।
बढ़ता हुआ हाउसहोल्ड डेट ट्रेंड
भारत में कई शहरी परिवारों का EMI-टू-इनकम रेश्यो 60% से ऊपर जा चुका है। प्रॉपर्टी की बढ़ती कीमतें और सैलरी में धीमी वृद्धि के चलते लोग बजट से बाहर जाकर घर खरीद रहे हैं, जिससे एक 'लॉक-इन' इफेक्ट पैदा हो गया है। लोग अपनी जीवनशैली बदलने या अनिश्चितताओं का सामना करने की स्थिति में नहीं रह गए हैं।
निवेशकों के लिए सबक
अपनी फाइनेंशियल हेल्थ जांचते समय केवल नेट वर्थ न देखें, बल्कि 'कैश फ्लो लिक्विडिटी' पर ध्यान दें। सलाह दी जाती है कि आपके पास कम से कम 6 से 12 महीने के खर्चों के बराबर एक इमरजेंसी फंड होना चाहिए, जिसमें आपकी EMI भी शामिल हो। याद रखें, होम लोन की असली कीमत केवल ब्याज दर नहीं, बल्कि वे जीवन के विकल्प हैं जिन्हें आप कर्ज के बोझ तले दबकर खो देते हैं।
