क्रेडिट कार्ड की सुविधा के पीछे छिपे हुए उच्च ब्याज और प्रशासनिक शुल्क आपकी बचत को धीरे-धीरे खत्म कर सकते हैं। मिनिमम ड्यू पेमेंट, फॉरेक्स मार्कअप और क्रेडिट यूटिलाइजेशन का सही गणित समझना आपके फाइनेंशियल भविष्य के लिए बेहद जरूरी है।
भारत में क्रेडिट कार्ड रोजमर्रा के खर्चों का अहम हिस्सा बन चुके हैं, लेकिन सुविधा के साथ इसमें बड़े वित्तीय जोखिम भी छिपे हैं। अगर आप सावधानी नहीं बरतते, तो 'मिनिमम ड्यू' भरने या बार-बार कैश निकालने की आदत आपको कर्ज के जाल में फंसा सकती है।\n\n### मिनिमम पेमेंट का जाल\nकई लोग सोचते हैं कि मिनिमम ड्यू भरना एक सुरक्षित तरीका है, जबकि यह एक कंपाउंडिंग ब्याज के चक्र को शुरू कर देता है। एक बार जब आप पूरा बिल नहीं चुकाते, तो 'इंटरेस्ट-फ्री ग्रेस पीरियड' खत्म हो जाता है। इसके बाद बकाया राशि और नई खरीदारी दोनों पर ब्याज लगता है, जिसकी सालाना दर 36% से 42% तक हो सकती है।\n\n### क्रेडिट यूटिलाइजेशन रेशियो (CUR)\nबैंक और क्रेडिट ब्यूरो इस पर कड़ी नजर रखते हैं कि आप अपनी कुल क्रेडिट लिमिट का कितना हिस्सा हर महीने इस्तेमाल करते हैं। यदि आप लगातार 30% से अधिक लिमिट का उपयोग करते हैं, तो यह लेंडर्स की नजर में नेगेटिव माना जाता है। इससे आपका क्रेडिट स्कोर गिर सकता है, जिससे भविष्य में होम लोन या कार लोन महंगा हो सकता है।\n\n### कैश विड्रॉल और फॉरेक्स के छिपे हुए खर्चे\nक्रेडिट कार्ड से एटीएम के जरिए कैश निकालना सबसे महंगी आदतों में से एक है। डेबिट कार्ड के उलट, यहां पहले दिन से ही ब्याज शुरू हो जाता है और साथ में भारी फीस व 18% GST भी लगती है। इसी तरह, विदेशी मुद्रा में ट्रांजेक्शन करने पर 1.5% से 3.5% का फॉरेक्स मार्कअप और उस पर GST लगता है, जो आपके द्वारा कमाए गए रिवॉर्ड पॉइंट्स से अधिक महंगा पड़ता है।\n\n### EMI का सच\nखरीदारी को EMI में बदलना बजट के लिए अच्छा लग सकता है, लेकिन इसमें छिपी लागत शामिल होती है। इसमें अक्सर आप शुरुआती डिस्काउंट खो देते हैं और ब्याज पर ब्याज के साथ GST का भी भुगतान करते हैं। बेहतर यही है कि आप क्रेडिट कार्ड को अपनी आय का हिस्सा नहीं, बल्कि सिर्फ एक पेमेंट टूल समझें और हर महीने पूरा स्टेटमेंट बैलेंस चुकाएं।
